Monday, November 21, 2016

जानते हैं फिर भी



जानते हैं-

कल्पना के घोड़े दौड़ाने को सात समंदर तो क्या सात आसमान भी कम है 
जीत तो सिर्फ उसी की होती है जो- 

वास्तविकता के धरातल पर उन्हें उतारने का भी 
माद्दा रखते हैं


मौसमों की उठा-पटक तो लगी रहनी है सदा दुनिया में 
बात उस मौसम की ही होती है जो -

 इस दुनिया की तासीर बदलने का माद्दा रखते हैं। 


सुख-दुःख,ज़रा -व्याधि ,जनम-मरण सबके साथ जुड़ा है 
आनंद की लहरों पर नौकायन तो वही कर सकते हैं जो -


 जीवनानुभवों की गहराई में उतरने का माद्दा रखते हैं


फिर भी - 

पता नही कभी-कभी मन में कौन आ बसता है-
 कि मन मनों भारी लगता है-

वरना तो हम सूरज को भी हाथों में उठाने का माद्दा रखते हैं 

6 comments:

Pratibha Verma said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

दिलबागसिंह विर्क said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 24.11.2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2536 पर दिया जाएगा
धन्यवाद

HindIndia said...

शानदार पोस्ट .... बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति .... Thanks for sharing this!! :) :)

dilipkumarpaswan said...

बहुत ही सुंदर तरीके से शानदार पोस्ट के साथ प्रस्तुत किया गया है। धन्यवाद।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

क्या बात!

रश्मि प्रभा... said...

आज भी वो बात मौजूद है तुममें, सूरज को हाथों में भरकर चल सकती हो