Sunday, October 1, 2017

कुछ भी लिखा,ब्लॉग की खातिर ..

मुझे लगता है मेरी आँखें अंदर की तरफ घूम गई है,दूरदृष्टि मेरी रही नहीं ,पास का दिखाई नहीं देता ,शायद अब सब अंदर का देखना पड़  रहा है ,इसी का नतीजा मिल रहा है मुझे कविता के रूप में ,कविता बह निकलती है जब-तब इसी ब्लॉग या फेसबुक पर... 

मेरे जैसे कई लोगों की कवितायेँ बहती हुई दिखती हैं यहां ,उसी से पता चलता है -दिल कितना छोटा सा है ,कभी भी फट सकता है , आसपास की बहती कविताओं से टॉनिक लेना पड़ता है ,लोग आर्ट ऑफ़ लीविंग छोड़ आर्ट ऑफ़ डाईंग सिखा रहे हों जैसे। .. 

भला जानबूझकर मधुमक्खी के छत्ते में कौन हाथ डालेगा और वो भी तब ,जबकि दिख रहा हो की छत्ता बहुत बड़ा है और बहुत सी मधुमक्खियां उस पर बैठी हैं| पर क्या करें मीठा खाने की जिसको आदत पड़ गई हो उसे तो भगवान बचाए। ..और वो भी शहद खाना हो तो हाथ तो डालना ही पड़ेगा ... ठीक वैसे ही जैसे -ब्लॉग बनाया तो पोस्ट भी लिखनी ही पड़ेगी ..
यानि बस अभिव्यक्त होना है... जैसे विरोध होने लगा है ... तू हाँ बोल! मैं ना बोलता हूँ, एक तो सही ही होगा .. करोड़ मिले तो बाँट लेंगे...👍

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (03-10-2017) को "ब्लॉग की खातिर" (चर्चा अंक 2746) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, भूत, वर्तमान और भविष्य “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !