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Friday, March 31, 2017

सृष्टि की रचना और चित्र वैचित्र्य

दो रचनाएं पढ़ी फेसबुक पर पहली वाणी गीत जी की सृष्टि की रचना ...और दूसरी आशीष राय जी की चित्र वैचित्र्य ...
और सहज टिप्पणियां हुई -

ईश्वर ने जब रचा होगा ये संसार
मन रहा होगा उसका निर्विकार
साकार किये जब उसने स्त्री और पुरुष
आया न होगा कोई विषम विचार
न मुग्ध हुआ ,न खिन्न हुआ,पर
किया उसने सुन्दरतम विस्तार...

रचकर ये संसार सिखाया
उसने हमको कर्म
न कोई है - अपना पराया
समझा न कोई मर्म
वाणी का आशीष न देकर
अगर वह रह जाता जो मौन
चित्र वैचित्र्य इतना सुन्दर
हमको दिखलाता फिर कौन ?....

Friday, October 7, 2016

उम्मीद की एक किरण

फटने न देना कभी मन में छाए घने बादलों को,
वरना सबके साथ खुद का वजूद भी नजर नहीं आएगा ...

तबाही फैलाने को नहीं है ये मन तुम्हारा,

उम्मीद रखो रिश्ते का रेगिस्तान भी हरा नजर आएगा...



कुछ बातें फ़िर भी सदा अनकही ही रहेंगी
मौन हों जब कलम तो अश्रु भर आंखे कहेंगी....


अर्थ अश्रुओं का न समझा पाई है कभी लकीरें
उम्मीद की एक किरण बदल देती है तकदीरें........
-अर्चना

Tuesday, October 7, 2014

फेसबुकी कतरन - प्रेम

तुम्हारे पास दिल है,
मेरे पास भी दिल है...

तुम मुझसे प्रेम करते हो,
मैं तुमसे प्रेम नहीं करती...

तुम उग्र हो जाते हो,
मैं धैर्य रखती हूँ ...

तुम्हारा अपमान होता है,
मेरा भी अपमान होता है....

क्या दिल सिर्फ़ तुम्हारे पास है?
या दिल, मेरे पास भी है ? ...
-अर्चना

Friday, September 26, 2014

फ़ेसबुक से कतरे ...

चाँद अब रहता है देर तक सुबह होने के बाद भी
कहीं सूरज की तबियत तो खराब नहीं जाड़े में ....

या कि चाँद पर लोगों के जमीन ले लेने से
चाँद को जगह लेनी पड़ी सूरज से भाड़े मे...
-अर्चना


सोचा था,
आज मैं
चुप ही रहूंगी
कुछ न कहूंगी
पर तुम हो न!
बस! सुनने का
ठेका लिए बैठे हो
कभी तो दो शब्द बोलो
कि मैं सुनूँ "प्रेम"....

-अर्चना