न गज़ल के बारे में कुछ पता है मुझे, न ही किसी कविता के, और न किसी कहानी या लेख को मै जानती, बस जब भी और जो भी दिल मे आता है, लिख देती हूँ "मेरे मन की"
Saturday, January 25, 2020
स्नेहल लक्ष्मी
Wednesday, June 21, 2017
Tuesday, September 13, 2016
कावेरी का अंत
नारद - नारायण,नारायण..
(आवाज सुनते ही )
भगवन - कहो नारद,कैसे हो?कब लौटे पृथ्वीलोक से?कैसी रही नदी मिलन यात्रा?कावेरी कैसी है?
नारद-साँस तो लें भगवन, ...न पूछें तो ही अच्छा है, बेचारी तप रही है आग से .... उसी का संदेस लाया हूँ ,कह रही थी - मुझे बर्फीली नदी बनना है ...गन्दगी तो सहन कर लूँगी पर आग में झुलस कर तंग आ गई हूँ,बर्फ होकर बहूंगी तो कुछ तो पानी बचेगा..और नहीं बही तो जिसके हिस्से में जितनी हूँ वहीँ जम रहूंगी ... मेरा पानी बचाने... आग को तो परेशान नहीं करेंगे ये आँखों का पानी सूखाए लोग!
भगवन- जाओ नारद ,कावेरी को साथ ले आओ...बहुत बह ली ...लोग तो उसे चुल्लू भर न उपयोग कर पा रहे... :-(
और एक नदी का अंत हुआ....
Thursday, March 26, 2015
खप्ती... (लघुकथा)
खप्ती!
हाँ यही नाम पुकारते थे उसका,मैंने अपने बचपन में सुना था ,..तब शायद ७-८ साल की रही होंउंगी ......आज तक याद है ,उसका चेहरा भी नाम के साथ ही याद आ जाता है ....
सामूहिक भोज में जब समाज के सारे लोग इकट्ठा होते तो खप्ती धर्मशाला के सामने घूरे के ठेर पर बैठी रहती ..उसके ३-४ बच्चे उसके इर्द-गिर्द चिपटे रहते ......कोई गोदी में तो कोई पीठ पर ...कौन लड़का है-कौन लड़की कुछ भी अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता था ....कोई उससे थोड़ी दूर चला जाता तो जोर से चीख कर उसको पास आने को कहती ...उसके आस-पास ही गाय-बछड़े,कुत्ते भी बैठे या घूमते रहते ....कोई उसको छूता नहीं था... एक बेटी थोड़ी बड़ी थी .
.. जैसे ही पहली पंक्ति की जूठी पत्तलें लाकर बाहर फ़ेंकी जाती ...वह बड़ी बेटी के साथ दौड़ कर पत्तलें छांटने आगे आ जाती ..जिसमें चावल के दाने चिपके होते या कोई बरफ़ी का टुकड़ा मिलता ....श्रीखंड उसके बच्चों को बहुत पसन्द था ...खूब दोने इकट्ठे करती ...और फिर सारे बच्चों को साथ बैठकर पत्तलें चाटकर खिलाती और खाती ......
मैंने कभी उन बच्चों के पिता को नहीं देखा ....
.... अब वहाँ घूरा नहीं है ....उस जगह बिल्डिंग बन गई है, धर्मशाला भी नई इमारत में बदल गई आज भी धर्मशाला के सामने से गुजरने पर उसकी याद आती है ..
..अब पत्तलों में लोग खाना नहीं खाते ...खाना छोड़ते हैं ....
पर खप्ती और उसके बच्चे नहीं हैं जूठन खाने को .... शायद बड़े हो गए होंगे ...... भौतिक रूप से कहाँ होंगे नहीं पता ...पर मेरे दिल में हैं ...मैं याद करती हूं ..... वे भी भूले तो नहीं ही होंगे अपना बचपन और अपनी खप्ती माँ को .... .... :-(
Thursday, May 9, 2013
अन्तिम ईच्छा
टेक्नोलॉजी के युग में भगवान ने टेब ऑन किया , मेरा मुस्कुराता चेहरा प्रोफ़ाईल में देखकर खुश हो गए ...
मेरी वॉल पर स्टेटस लिखा- वरदान माँग...
मैंने मौके की नज़ाकत को समझा और वरदान में अन्तिम ईच्छा लिख दी - मेरी मौत की खबर या फोटो फ़ेसबुक पर शेअर न की जाए.... अगर कहीं गलती से किसी स्टेटस पर आ भी जाए तो वो आपका स्टेटस हो ... और उसे सिर्फ़ लाईक करने का ऑप्शन खुला हो ...
मेरी वॉल पर अगला स्टेटस था --- तथास्तु...
Sunday, April 22, 2012
क्या तुम और क्या मैं !!!
शानदार आलीशान फ़ुटपाथ पर रहने वाले दो बच्चे सोनू और मोनू की बातचीत...
सोनू- और क्या भीड़ू ?
मोनू- मस्त है...अपनी बताओ..
सोनू- अपुन बी मस्त! ...आज शाम का क्या प्रोग्राम है?
मोनू- कुछ नई... वोSS..काका को छुट्टन को लेके दवाई दूकान पे जाने वाला है ,तो उसका ठेला देखने का है एक घन्टा ..उसके बाद फ़्री...क्यों?
सोनू- नई ..वो माँ को बुखार है, तो बंगले पे जाने का है,...सोचा ...मैं जब तक काम निपटाउँगा.... तू बाबू साब की कॉपी में चित्र बना देता.....
लघुकथा- अर्चना
ये महज एक लघुकथा नहीं ....एक बहुत बड़ी-सी कथा है मेरे लिए....
शानदार आलीशान फ़ुटपाथ ....आजकल हर जगह सड़कों और फ़ुटपाथों के निर्माण की प्रक्रिया चालू है ....और घर बदलते कई परिवार नये फ़ुटपाथ पर बसते दिखाई दे जाते हैं ....
सुबह स्कूल जाने के समय पूरे परिवार की भागदौड़ी ...काम की तलाश ...बच्चों की बेफ़िक्री ....बड़े भाई-बहनों की गोद में रोते छोटे बच्चे ...जैसे दॄश्य आम हैं....
और बाबूसाब की कॉपी.....माँ के साथ काम पर जाने वाले बच्चे की निगाह बँगले में रहने वाले बच्चे की खेलने -पढ़ने की चीजों पर रहती ही होगी ..सोचती हूँ उनमें भी कई कलाकार छुपे होंगे....
Wednesday, March 28, 2012
सूखा गुलाब !!
--नमस्ते..
-- मैं आपको पसंद करता हूँ...
--??? क्या मतलब? ....कहते हुए चौंक गई मैं (अपनी जन्मतारीख भी याद करने लगी थी...कन्फ़र्म ५० पूरे हो चुके हैं)
--सॉरी........ यानि मैं आपका लिखा पसंद करता हूँ....
--ओह!!!, तब ठीक है .....कातिल मुस्कान (यही कहते हैं सब :-)...)छा गई चेहरे पर मेरे ....आगे कहा -पर मुझे तो लिखना ही नहीं आता ....
-- नहीं ,नहीं आप ऐसा कैसे कह सकती हैं ? मैनें पढ़ा है आपको ,वो SSS..........बुक पर ...और देखा भी है .....
और मैं आँखें बन्द कर सोच रही हूँ ---बुक में देखा!!! अरे हाँ याद आया एक सूखा गुलाब ! है तो मेरी बुक में भी ....
साथ में गीत चल रहा है--- पल-पल दिल के पास तुम रहती हो..............
...और जाने कब गीत खतम हो गया ..गुलाब की खुशबू तो अब भी आ रही थी........
अचानक गेट पर किसी के ठकठकाने की आवाज़ आई और आँखें खुली मेरी.......और तभी ...
...... शुरू हो गया अगला गीत - वो शाम कुछ अजीब थी ये शाम भी अजीब है .....
Sunday, January 29, 2012
मुनिया का बचपन
---अपनी माँ से कहा रोते-रोते मुनिया ने...
माँ ---अरे!! ऐसे कोई चिढ़ता है क्या ?? तू भी तो उसे मोटा,कालू कह रही है ....
---मगर माँ मै तो उसे वही कहती हूँ जो वो है ....और वो मुझे वो कहकर चिढ़ाता है जो मैं नहीं हूँ ..
ऐसा भला कैसे??? माँ का सवाल था ।
--माँ देखो !! वो मुझे मोटी कहता है, मैं मोटी नहीं हूँ न ?.....हँस दी थी माँ ...
--तो ये तो वो आज थोडे़ ही न कह रहा है पहले भी कहता रहा है ..दोस्त है तेरा, दोस्त की बात का बुरा नहीं मानते...
...समय के थपेड़ों से बच्ची बन चुकी अपनी पचास वर्षीया बेटी मुनिया का सर अपनी गोदी में रख बालों को सहलाते हुए तिहत्तर वर्षीय माँ समझा रही थी.....
मुनिया का कहना जारी रहा---- वो अब मुझे "देवी" कहता है ....क्या मैं देवी हूँ ? माँ तुम तो कहती हो सब कुछ देवी की ईच्छा से होता है ....क्या सब कुछ मेरी ईच्छा से हुआ है ? माँ अब चुप थी .....
..और मुनिया ..........फ़िर पीछे दौड़ पड़ी थी अपने दोस्त को कालूउउउउउउ मोटेऎऎऎऎऎ कहते हुए............
बचपन में जीना और बचपन को जीना सीख लिया था मुनिया ने ..........
Tuesday, November 15, 2011
स्नेह का रिश्ता..
एक दिन ऐसे ही चेक किया तो आठ-दस बच्चे ऑनलाईन थे,(आजकल जरूरत हो गई है ऑनलाईन रहना :-) )
मैनें सहज ही चेट बॉक्स में लिखा -"स्नेहाशीष"
तुरंत कई बच्चोंने रिप्लाय दिया---- किसी ने "नमस्ते",किसी ने "हेलो", तो कोई "हाय" पर भी आ गया था ।
अचानक मेसेज मिला अंकित का-- "चरण वंदना" , मुझे आप ज्यादा आशीष दें, क्योंकि जिस पर ज्यादा गुस्सा करते हैं उसी से ज्यादा प्यार भी करते हैं।
मैंने जबाब दिया-- मैनें सबको समान दिया है ,कोई भेदभाव नहीं।
बाकि बच्चों के भी उत्तर आने लगे --कोई कह रहा था मैं ज्यादा पुराना स्टूडेंट हूँ,इसलिए मुझे.....
कोई---आप मेरी टीचर नहीं "Mom" हो इसलिए मुझे .....वगैरह..वगैरह...
मैं सबको सिर्फ़ पढ़ रही थी ।
अंकित का जबाब आया ---आपने दस साल पहले मुझे एक चाँटा मारा था,सारे दोस्तों के सामने ,वो आज भी याद है मुझे ..इसलिए मुझे ...
बहुत आश्चर्य हुआ मुझे इस बात का..मैं भी भूल नहीं पाई थी , न वो भूला था।
मैने कहा- अगर यहाँ लिख सको किस बात का तो....."नहींईईई ...बहुत गंदी बात थी वो.....नहीं लिख सकता ...
......और मुझे याद आ रहा था वो अंकित, जिसे उसके पापा और चाचा गाँव से शहर .बेहतर पढ़ाई की सुविधा के लिए होस्टल में लेकर आए थे,तब ५वीं-छठी में रहा होगा वो...
..होस्टल में आए आठ दिन हो चुके थे ,उसका मन नहीं लग रहा था, घर की याद सता रही थी, पेटदर्द का बहाना बनाया था उसने..और रो-रोकर बुरा हाल कर लिया था।
उसके पापा और चाचा को बुलाया गया था उससे मिलने,और उसने जिद्द पकड़ली कि वो यहाँ नहीं पढ़ेगा..किसान पिता समझाते रहे कि -"तुझे बड़ा आदमी बनना है",गाँव में कुछ नहीं है ,खेती में कुछ नहीं मिलेगा।..
एक ही बेटा था वो- तीन भाईयों के परिवार का...बहुत कड़ा मन करके दादा-दादी ने भेजा था उसे शहर ....
इसी बीच अंकित का अगला मेसेज था ---
--" आप अब भी उसी स्कूल में काम कर रही हैं?? छोड़ दिजिए अब .....मैं कमाने लगा हूँ , मेरे साथ रहियेगा...."
Tuesday, May 3, 2011
"गर्भनाल", अंक ५४ - मई २०११ , पेज नम्बर ४२...
विश्वास न हों तो देख लें---( यहाँ किसी और दिन छाप दूँगी )
ये रही लिन्क-----
http://www.garbhanal.com/Garbhanal%2054th.pdf
अगर देखने जा रहे हों तो आकर बताएं..पता तो चले कितने लोग विश्वास नहीं करते मुझ पर.....
Wednesday, April 20, 2011
अंतर.......
हम तीन भाई दो बहनें ,वो चार बहनों का अकेला भाई..
लाड़-प्यार में कोई कमी नहीं दोनो के यहाँ....बहुत ज्यादा तो नहीं पर जो थोड़ा बहुत याद आता है वो उम्र रही होगी १३-१४ साल की...
तब की बात ही और होती थी...तब को-एड नहीं होता था..
प्राथमिक शाला में सब साथ -साथ पढ़ते फ़िर होती थी कन्या माध्यमिक,उच्चतर माध्यमिक शाला इसी तरह बालक माध्यमिक व बालक उच्चतर .....
और यहाँ तक कि अलग स्कूल में पढ़ने की तरह खेलने के मैदान भी अलग .....आधे यहाँ ,आधे वहाँ....अंतर शुरू....
मैं सिमट कर रही और वो...बिखर कर.....
मेरी पसन्द गुम होने लगी...उसकी पसन्द का खयाल रखा जाने लगा......मुझे समय पर घर आना होता था ....वो घर आकर भी बाहर जा सकता था......
मुझे खाना बनाना सिखाया जाने लगा .और उसे खाना खाना......
नतीजा ....वही मैने मन को संयम में रखकर सब सीखा ..और उसने मन भी खो दिया....संयम कहाँ रहता ...
अब कई साल बाद फ़िर मिली हूँ उससे....मेरी शादी के बाद सुना था उसकी भी शादी कर दी गई......
कहते हैं न मुसीबतें किसकों नहीं आती.......दोनों पर आई...
मैं लड़ती रही हमेशा उनसे और वो......सिगरेट और शराब में मुसीबतों को डुबाते रहा.....जिंदगी चलती रही मेरी भी और उसकी भी.......
अब वो बीमार है और उसकी माँ,पत्नि,बेटी उसकी देखभाल करती है.......
सोचती हूँ, मैं अगर बीमार हुई तो .....कोई नहीं होगा....
मै फ़िर अकेली.........
क्यूँ सोचती हूँ मैं................

