Showing posts with label लेख. Show all posts
Showing posts with label लेख. Show all posts

Wednesday, November 11, 2009

हम कहाँ के हैं मम्मी -------?????

ये एक बहुत बडा प्रश्न है मेरे लिए। दरअसल मै जहाँ रह रही हूँ,वहाँ कभी रहूँगी ऐसा मैने सपने मे भी नही सोचा था,मै जहाँ रहती थी वो जगह मजबूरी में मुझे छोड देनी पडी,जहाँ मै रहना चाहती थी वो जगह मुझे नही मिली,अब मै कहाँ रहूँगी ये मुझे नही मालूम,मै एकदम सच कह रही हूँ---
कल भाषा को लेकर जो खबर सुनने में आई तो सब कुछ याद गया अपने बारें में-------
मेरा जन्म मध्यप्रदेश के छोटे से गाँव खरगोन में हुआ,पढाई भी यहीं की। शादी हुई,---ससुराल नागपूर, (महाराष्ट्र) में है। हमारे पूर्वज गुजरात में रहते थे , कई पीढी पहले वे शायद रोजी रोटी की तलाश मे वहाँ से चले-------कुछ लोग मध्यप्रदेश मे, कुछ लोग महाराष्ट्र में जाकर बस गये-------जो लोग मालवा,निमाड, मे आकर बसे उनके रीती रिवाज,बोली, खान-पान,पहनावा, सबमें यहाँ के रहन-सहन बोली,खान-पान,पहनावा मिल गये ,जो लोग महाराष्ट्र की तरफ़ गये उन लोगो ने वहाँ का पहनावा, रहन-सहन खान-पान बोली सब अपना लिया हम लोगों का आपस में संपर्क भी बहुत कम रह गया।
मेरी शादी हमारे आपसी रिश्ते को मजबूती देने के उद्द्येश से की गयी थी। हमने एक-दूसरे कॊ बहुत समझा भाषा की परेशानी होते हुए भी आपसी सामंजस्य आजतक बरकरार रखा है ।जब मै पहली बार ससुराल गई तो शादी की पार्टी मे बधाई के साथ एक सवाल से मेरा सामना हुआ था-----तुम्हे मराठी नही आती ?अब भला मै क्या जबाब देती? मगर ये सवाल कुछ इस तरह पूछा गया कि मै आज तक भी मराठी नही बोल पाई , मेरी सासुजी मराठी मे कुछ पूछ्ती हैं तो मै हिन्दी मे जबाब देती हूँ और जब मै कुछ पूछ्ती हूँ तो वे मराठी में जबाब देती है हम दोनो को ही आजतक बात करने और समझने में कोइ परेशानी नही आई है|
जब शादी हुई थी पतिदेव आसनसोल( बंगाल ) में कार्यरत थे, तीन वर्ष बाद तबादला हुआ----हम राँची (बिहार) में गये। ओफ़िस के कार्य से पति गोहाटी( आसाम) गये थे, वहाँ से किसी कार्यवश शिलोंग (मेघालय ) जाना पडा-----रास्ते में एक्सीडेन्ट हॊ गया-------बहुत गम्भीर चोट आई-----फ़िर गोहाटी, आसाम के बहुत बडे न्यूरोलॊजी अस्पताल में दो महीने कोमा मे रहने के बाद(याददाश्त चली गई थी) चिकित्सकॊ के भरसक प्रयास के बाद, टूटे हाथ का ओपरेशन करवाने तब बाम्बे( महाराष्ट्र) वापस आये----दस बारह दिनॊं के बाद घर नागपूर(महाराष्ट्र) में होने के कारण नागपूर आना तय किया। दो - ढाई माह तक CIIMS (अस्पताल का नाम) में रखने के बाद चिकित्सको ने घर पर ही रखने की सलाह दी सो घर ले आये कुछ परिस्थितियाँ ऐसी बनी की वापस खरगोन लौटना पडा। अथक प्रयासों के बाद भी उन्हें बचाया जा सका ।आज इस बात को १४ वर्ष बीत चुके हैं।
ये हादसा हुआ तो जिन लोगो ने मेरी हमारे परिवार की मदद की वे भारत के हर प्रान्त के सदस्य थे मै उन सब की आभारी हूँ ,एक-दूसरे की भाषा जानने पर भी सहयोग भरपूर मिला, हम एक दूसरे की सारी बातें भी समझ गये।
मुझे आज भी याद है क्रष्ण्न साहब ने मुझे इस हादसे की खबर सुनाई थी ,सिंग जी के यहाँ मै दोनो बच्चो---५वर्षीय बेटी पल्लवी और ७वर्षीय बेटे वत्सल को अकेले छोड्कर शाशिदादा(मेरे कजिन जेठजी) के साथ पहली बार हवाई यात्रा कर कलकत्ता पहूँची थी ,वहाँ से दूसरे दिन ही उडान थी गौहाटी के लिये इसलिए दास साहब के घर मुझे रुकवाया गया था वहाँ मेरी दादी और नानी जैसी उनकी माँजी और बुआजी रात भर मेरे सिर पर हाथ फ़ेरते हुए मेरे सिरहाने जागते बैठी रही। सुबह इनके साहब रामचन्द्रन साहब भी हमारे साथ गौहाती के लिए रवाना हुए थे-----जब मै होस्पिटल मे पहूंची तो डाक्टर चक्रवर्ती सीढी पर ही अपने साथियो के साथ मेरी राह देख रहे थे ।रात गेस्ट हाऊस मे आने पर जब घबराकर मेरी रुलाई रोके नही रुक रही थी तक बजे रात में गेस्ट हाउस मे काम करने वाले पूर्वोत्तर के भाईयो ने मुझे चाय बनाकर पिलाई, वे भी मेरे साथ जागते रहे थेसुबह एक कार ओफ़िस की ओर से अस्पताल आने -जाने के लिए दवाई वगैरा की व्यवस्था के लिए दी गई उसके ड्राईवर विजय यादव कॊ मै मरते दम तक नही भूल सकती दिन रात जागकर विजय ने हमारे लिए जो कुछ भी किया उसके लिए मै उसे नमन करना चाहती हूँ विजय जब चौथी कक्षा में पढता था ,बिहार के एक गाँव से भागकर वहाँ पहूंचा था,उसने हमसे पारिवारिक रिश्ता~ कायम किया था | वहाँ जो दो बडे साहब मुझसे मिले वे चालना साहब पंजाब व वर्मा साहब उत्तरप्रदेश के रहने वाले थे , दो माह तक इन दोनो परिवारों ने मेरा, मेरी माँ,भाई सास-ससु्र जी का अपने परिवार के सदस्यों की तरह ध्यान रखा । खैर !!!

बात ये नही थी कि मेरे साथ क्या हुआ था बात ये है कि जब ये हादसा हुआ तो मेरे बच्चे बहुत छोटे थे ,वे आसनसोल में बंगाली भाषा समझते थे,फ़िर बिहारी भाषा का प्रभाव उन पर पडा।.( इस बीच करीब चार माह तक वे स्कूल नही जा पाये थे) परिस्थितिवश वे नागपूर में करीब डेढ साल तक रहे वहाँ मराठी से सामना हुआ फ़िर खरगोन यहाँ गुजराती -----जिसमे कि स्थानीय भाषा का प्रयोग ज्यादा किया जाता है, समझने की कोशीश करते रहे .............दोनो की पढाई अंग्रेजी माध्यम से हुई -------आज बेटा नोइडा में है उसका बोलने का लहजा वहीं के लोगॊ की तरह का है परन्तु सारी भाषाओ जिनसे उसका सामना हुआ समझता है , बेटी पूना में ग्रेजुएशन करने के बाद बंगलोर में है मराठी अच्छी तरह से बोल लेती है और आश्चर्य नही होगा कि थोडे दिनॊ में दक्षिण भारतीय भाषाओं कॊ थोडा समझने लगे

आज भी मुझसे जब ये प्रश्न पूछा जाता है कि आप कहाँ के है? तो मै खुद सोच में पड जाती हूँ कहती हूँ वैसे तो हम गुजराती ब्राह्नण हैं मगर ससुराल में मराठी रिति-रिवाज माने जाते हैं,पर मुझे वहाँ रहने का मौका नही मिला, मै बंगाल,बिहार मे महाराष्ट्र से ज्यादा रही, लेकिन अभी मध्यप्रदेश मे रहती हूँ ...........अगले २-३ सालो मे बच्चों की नौकरी जहाँ लगेगी वहाँ रहूँगी इसलिए मैं कहाँ की हूँ????पता नहीं ..................
और अब बच्चे बडे हो गये हैं ये सवाल उनके सामने भी आयेगा और वे फ़ोन पर मुझसे पूछेंगे हम कहाँ के हैं मम्मी ?????

Sunday, July 26, 2009

जो होता है अच्छे के लिये होता है--------

आज जब मै स्कूल पहुंची थी,सब कुछ ठिक-ठाक था---मसलन---बारिश नही हो रही थी ,सभी बसें समय पर पहुँच चुकी थी ,प्रार्थना की घंटी भी समय पर ही बजी थी ---और रोज की तरह सब बच्चे चेकिंग के डरावने माहौल से निकलकर अपनी-अपनी कक्षाओं में जा चुके थे ......
अभी मै बस बच्चों को भेजकर पलटी ही थी कि एक सर (साथी) ने बताया ------आपका मोबाईल बज रहा है.....
मुझे लगा दोनो बच्चों मे से किसी का होगा.....जब तक पर्स तक पहुँचू कि बजना बन्द हो गया.........फ़िर भी दोबारा बजने का इंतजार करते हुए मैने miss call (अब इसे हिन्दी में क्या लिखूं) देखा.........पर ये क्या ...ये तो स्कूल ओफ़िस से ही था.......क्या हुआ होगा ??? सोचते-सोचते ओफ़िस में पहूँची.................. दरवाजे पर ही प्रिन्सिपल मेडम खडी थी ......वे मेरा ही इंतजार कर रही थी..............देखते ही बोली..................अर्चना एक काम करो............आज तुम लाईब्रेरी में बैठ जाओ..........( उनके चेहरे पर कातिलाना मुस्कुराहट थी ).........लाईब्रेरी! ! !..........मैने लगभग चीखते हुए दोहराया था......................हाँ , उसी चिरपरिचित मुस्कुराहट को हँसी मे बदलते हुए वे बोली आज अपनी लाइब्रेरियन मेडम नही आयी है..................और मुझे भी बरबस हँसी ही गयी .....हँसते हुए ही मैने कहा--------------बस यही काम करना बाकी था..............ओफ़िस स्टाफ़ के चेहरे भी खिल उठे ...........उन्हे तो जैसे भगवान मिल गये............फ़टाफ़ट अरेंजमेंट की डायरी पर मेरा नाम चढा दिया गया............. पिछले ग्यारह सालों मे अपने स्कूल के लिये मैने हर विभाग मे कार्य किया है ................ (अब विद्यालय परिवार की भरोसेमंद कर्मचारी बन गयी हूँ मै) ...... मैने कातर नजरों से देखा....................सातों के सातों पिरियड मुझे दे दिये गये थे .........फ़िर भी हिम्मत करके मेडम से कहा -----सातो पिरियड मुझे ही लेने होंगे ??? मेडम -----हाँ बच्चे बारिश में बाहर भी तो नही जा सकते ???................मै बोल पडी -------मेडम एक काम करती हूँ .......लाईब्रेरी के बदले मै हर एक क्लास में चली जाती हूँ.................कम से कम एक जगह तो नही बैठना पडेगा...............फ़िर कुछ सोच कर मेडम ने कहा--------नही तुम सिर्फ़ ११-१२ वी क्लास के बच्चों के पिरियड ले लो............ठीक है ( दो पीरियड तो घूम पाउंगी मै सोचकर )..............खुश हो गयी मै...........पहली बार लाईब्रेरी में इतनी देर तक रूकना था...........(सच्ची अपनी जिन्दगी में अब तक लाईब्रेरी में कभी पढाई की हो या कुछ भी पढा हो , याद नही आया )..........खैर..........अब जब बच्चों के सामने बैठना ही था तो एक -दो पुस्तकों पर नजर डाली ---------------और नीचे के खाने में रखी एक संस्कृत की किताब पर नजर पडी-----------कुल या चार साल ही संस्कृत पढी होगी मैने ..........पर बहुत मजा आता था उसके श्लोक पढकर ...सो उसी को उठाया और जो कुछ मेरे हाथ लगा .............कुछ श्लोक ( इन्हे श्लोक ही कहते है ना ?) उनके अर्थ------ जैसा मैने समझा----------शायद आपने भी कभी पढ़े हो तो याद जायेगे या पढ़े हो तो (शायद) अच्छे लगेगे ..................

--- हस्तस्य भूषणं दानं , सत्यं कण्ठस्य भूषणम्
श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं ,भूषणें किं प्रयोजनम्
अर्थ --हाथ का आभूषण दान है , गले का आभूषण सत्य है , कान का आभूषण शास्त्र या अच्छा श्रवण है , तोफ़िर आभूषणो(गहनों) की क्या आवश्यकता है ?

---उद्यमेन् हि सिद्ध्यन्ति , कार्या्णि मनोरथै:
नहिं सुप्तस्य सिंहस्य , प्रविशन्ति मुखे म्रगा:
अर्थ-- मेहनत करने से ही कार्य पूरे होते है , सिर्फ़ इच्छा करने से कार्य पूरे नही होते , जिस प्रकार कि सोये हुएसिंह के मुंह मे हिरण भोजन के रूप मे प्रवेश नही करता (उसे शिकार करना पडता है भोजन के लिए )

---यथा हि एकेन चक्रेण , रथस्य गति: भवेत्
एवं पुरूषकारेण् विना , दैवं सिद्ध्यति
अर्थ् -- जिस प्रकार एक चक्के ( wheel ) से रथ की गति नही हो सकती, उसी प्रकार परिश्रम केबिना (without effort ) भाग्य ( destiny) सफ़लता नही देता

---नमन्ति फ़लिन: व्रक्षा , नमन्ति गुणिन: जना:
शुष्क व्रक्षाश्च मूर्खाश्च् , नमन्ति कदाचन्
अर्थ-- फ़लदार व्रक्ष /गुणी लोग , झुकते है/नमस्कार करते हैं , परंतु सूखे हुए व्रक्ष और मूर्ख लोग कभी नहीझुकते है

--- म्रक्षिका: व्रण:मिच्छन्ति , धनमिच्छन्ति पार्थिवा:
नीच: कलहमिच्छन्ति , शान्ति मिच्छन्ति साधव:
अर्थ-- मक्खियाँ घाव चाहती है , राजा धन चाहता है या धनप्राप्ति की ईच्छा रखता है , नीच लोग ( mean minded people ) झगडा चाहते हैं , और अच्छे लोग ( good people ) शान्ति ( peace ) चाहते है

--- अक्रोधेन जयेत् क्रोधम् , असाधुं साधुनां जयेत्
जयेत् कदर्यं दानेन् , जयेत सत्येन चान्रतम्
अर्थ-- क्रोध को ,क्रोध करके जीतना चाहिये , दुष्ट (bad person/a wicked ) को साधुभाव (by being good ) द्वारा जीतना चाहिये , कंजूसी (miserliness ) को दान द्वारा ( by being generous ) जीतना चाहियेऔर झूठ को सत्य द्वारा (by truth , i.e. by being truthful ) जीतना चाहिये


ये सब उस किताब से उतारने मे कब समय बीत गया पता ही नही चला.........धन्यवाद मेडम का.........जिन्होने आज लाईब्रेरी से मुझे रूबरू करवाया..........

विशेष :--- प्रयास किया है शुद्ध लिखने का फ़िर भी कुछ मात्राएँ ( र ) की टाईप नही करना आता , इसलिये
( वहाँ गलती है --- अर्थ स्वयं लिखे है , गलती संभव है ------क्षमाप्रार्थी हूँ