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Friday, April 15, 2016

भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलीस्तोत्रान्तर्गतं महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम्


॥ भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलीस्तोत्रान्तर्गतं महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् ॥
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १॥
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ।
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २॥
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरते
शिखरिशिरोमणितुङ्गहिमालयशृङ्गनिजालयमध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३॥
अयिशतखण्डविखण्डितरुण्डवितुण्डितशुण्डगजाधिपते
रिपुगजगण्डविदारणचण्डपराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्डनिपातितखण्डनिपातितमण्डभटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४॥
अयि रणदुर्मदशत्रुवधोदितदुर्धरनिर्जरशक्तिभृते
चतुरविचारधुरीणमहाशिवदूतकृतप्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीहदुराशयदुर्मतिदानवदूतकृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५॥
अयि शरणागतवैरिवधूवरवीरवराभयदायकरे
त्रिभुवनमस्तकशूलविरोधिशिरोधिकृतामलशूलकरे ।
दुमिदुमितामरदुन्दुभिनादमहोमुखरीकृततिग्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६॥
अयि निजहुँकृतिमात्रनिराकृतधूम्रविलोचनधूम्रशते
समरविशोषितशोणितबीजसमुद्भवशोणितबीजलते ।
शिवशिव शुम्भनिशुम्भमहाहवतर्पितभूतपिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७॥
धनुरनुसङ्गरणक्षणसङ्गपरिस्फुरदङ्गनटत्कबके
कनकपिशङ्गपृषत्कनिषङ्गरसद्भटशृङ्गहतावटुके ।
कृतचतुरङ्गबलक्षितिरङ्गघटद्बहुरङ्गरटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८॥
सुरललनाततथेयितथेयितथाभिनयोत्तरनृत्यरते
हासविलासहुलासमयि प्रणतार्तजनेऽमितप्रेमभरे ।
धिमिकिटधिक्कटधिकटधिमिध्वनिघोरमृदङ्गनिनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९॥
जय जय जप्यजये जयशब्दपरस्तुतितत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्जिमिझिङ्कृतनूपुरसिञ्जितमोहितभूतपते ।
नटितनटार्धनटीनटनायकनाटितनाट्यसुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १०॥
अयि सुमनःसुमनः सुमनः सुमनः सुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनीरजनीरजनीरजनीरजनीकरवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११॥
सहितमहाहवमल्लमतल्लिकमल्लितरल्लकमल्लरते
विरचितवल्लिकपल्लिकमल्लिकझिल्लिकभिल्लिकवर्गवृते ।
सितकृतफुल्लिसमुल्लसितारुणतल्लजपल्लवसल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२॥
अविरलगण्डगलन्मदमेदुरमत्तमतङ्गजराजपते
त्रिभुवनभूषणभूतकलानिधिरूपपयोनिधिराजसुते ।
अयि सुदती जनलालसमानसमोहनमन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३॥
कमलदलामलकोमलकान्तिकलाकलितामलभाललते
सकलविलासकलानिलयक्रमकेलिचलत्कलहंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुलकुवलयमण्डलमौलिमिलद्भकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४॥

करमुरलीरववीजितकूजितलज्जितकोकिलमञ्जुमते
मिलितपुलिन्दमनोहरगुञ्जितरन्जितशैलनिकुञ्जनिकुञ्जगते ।
निजगुणभूतमहाशबरीगणसद्गुणसम्भृतकेलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५॥
कटितटपीतदुकूलविचित्रमयूखतिरस्कृतचन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुरमौलिमणिस्फुरदंशुलसन्नखचन्द्ररुचे ।
जितकनकाचलमौलिपदोर्जितनिर्झरकुञ्जरकुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६॥
विजितसहस्रकरैकसहस्रकरैकसहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारकसङ्गरतारकसङ्गरतारकसूनुसुते ।
सुरथसमाधिसमानसमाधिसमाधिसमाधिसुजातरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७॥
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं स शिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमेवमनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८॥
कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुसिञ्चिनुते गुण रङ्गभुवं
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणिनिवासि शिवं
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९॥
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दुमुखीसुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २०॥
अयि मयि दीनदयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथाऽनुमितासि रते ।
यदुचितमत्र भवत्युररिकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१॥
॥ इति श्रीमहिषासुरमर्दिनि स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

Tuesday, December 11, 2012

दैनिक प्रार्थना...


दैनिक प्रार्थना .... 
उच्चारण की कुछ गलतियों के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ ,
(भविष्य में सुधार करने पर फ़िर इस प्लेयर को बदला जा सकेगा)

हरि: ऊँ !     हरि: ऊँ !!   हरि: ऊँ !!!  
ब्रम्हानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्,
द्वन्द्वातीतं गगनसदॄशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम्।

एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षीभूतम्,
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद् गुरूं तं नमामि॥

कर्पूरगौरं करूणावतारं संसारसारं भुअजगेन्द्रहारं,
सदावसन्तं ह्रदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥

नीलाम्बुजश्यामलकोमलांगं, सीतासमारोपितवामभागम्।
पाणौ महासायक चारूचापं, नमामि रामं रघुवंशनाथम्॥

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दमं कॄष्णं वन्दे जगद् गुरूम्॥

मूकं करोति वाचालं पंगुं लन्घयते गिरिम्।
यत्कॄपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥


ईशावास्यमिदं सर्वं यत् किं च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन् भुंजीथा: मा गॄध: कस्यस्विद्धनम्॥


प्रात: स्मरामि हॄदि संस्फ़ुरदात्मतत्वं
सत् चित् सुखं परमहंससगतिं तुरीयम्।
यत् स्वप्नजागरसुषुप्तमवैति नित्यं
यद् ब्रह्म् निष्कलमहं न च भूतसंघ:॥

प्रातर्भजामि मनसा वचसामगम्यं
वाचो विभान्ति निखिला यदनुग्रहेण|
यं नेति नेति वचनैर्निगमा अवोचं
स्तं देवदेवमजमच्युतमाहुरग्र्यम्॥
 

प्रातर्नमामि तमसः परमर्कवर्णं
पूर्णं सनातनपदं पुरूषोत्तमाख्यम्।|
यस्मिन्निदं जगदशेषमशेषमूर्तौ
रज्ज्वां भुजंगम इव प्रतिभासितं वै॥
 
(पूरे श्लोक तो नहीं लिख पाई हूँ,लेकिन लेकिन अनूप शुक्ला जी के कहने पर कुछ को टाईप किया है ,भविष्य में एडिट करके पूरे लिख देने की कोशिश रहेगी)








Sunday, February 19, 2012

शिव -विवाह -- एक स्मॄति


पिछले वर्ष शिवरात्री पर्व पर इन्दौर में शिवजी के विवाह में जाने का अवसर मिला था (एक समारोह में)....उसी अवसर का ये चित्र -

 

और अब सुनिये प्रार्थना
 1-


2-


3-


4-


5-

Saturday, August 8, 2009

रावणकृत तांडव स्त्रोत्र ..........




पिछले सोमवार कंप्यूटर ख़राब होने कि वजह से पोस्ट नही कर पाई थी आज कीजिये ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन और मन्दिर के कुछ द्रश्य नर्मदा तट से ................................साथ ही सुनिए मेरे भाई देवेन्द्र द्वारा गाया गया -----"रावण कृत तांडव स्त्रोत्र"..........................(सारे चित्र गूगल से साभार ...)




























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Tuesday, July 28, 2009

शिव -स्तुति.................कल नही तो आज सही...........

कल बहुत कोशिश के बाद भी ये स्तुति पोस्ट नही कर पाई थी.............लोड ही नही हो पा रही थी .......खैर कोई बात नही ....कल नही तो आज सही.....................सुनिये ये शिव स्तुति..................



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Sunday, July 26, 2009

जो होता है अच्छे के लिये होता है--------

आज जब मै स्कूल पहुंची थी,सब कुछ ठिक-ठाक था---मसलन---बारिश नही हो रही थी ,सभी बसें समय पर पहुँच चुकी थी ,प्रार्थना की घंटी भी समय पर ही बजी थी ---और रोज की तरह सब बच्चे चेकिंग के डरावने माहौल से निकलकर अपनी-अपनी कक्षाओं में जा चुके थे ।......
अभी मै बस बच्चों को भेजकर पलटी ही थी कि एक सर (साथी) ने बताया ------आपका मोबाईल बज रहा है.....
मुझे लगा दोनो बच्चों मे से किसी का होगा.....जब तक पर्स तक पहुँचू कि बजना बन्द हो गया.........फ़िर भी दोबारा बजने का इंतजार न करते हुए मैने miss call (अब इसे हिन्दी में क्या लिखूं) देखा.........पर ये क्या ...ये तो स्कूल ओफ़िस से ही था.......क्या हुआ होगा ??? सोचते-सोचते ओफ़िस में पहूँची.................. दरवाजे पर ही प्रिन्सिपल मेडम खडी थी ......वे मेरा ही इंतजार कर रही थी..............देखते ही बोली..................अर्चना एक काम करो............आज तुम लाईब्रेरी में बैठ जाओ..........( उनके चेहरे पर कातिलाना मुस्कुराहट थी ).........लाईब्रेरी! ! !..........मैने लगभग चीखते हुए दोहराया था......................हाँ , उसी चिरपरिचित मुस्कुराहट को हँसी मे बदलते हुए वे बोली आज अपनी लाइब्रेरियन मेडम नही आयी है..................और मुझे भी बरबस हँसी आ ही गयी .....हँसते हुए ही मैने कहा--------------बस यही काम करना बाकी था..............ओफ़िस स्टाफ़ के चेहरे भी खिल उठे ...........उन्हे तो जैसे भगवान मिल गये............फ़टाफ़ट अरेंजमेंट की डायरी पर मेरा नाम चढा दिया गया............. पिछले ग्यारह सालों मे अपने स्कूल के लिये मैने हर विभाग मे कार्य किया है ।................ (अब विद्यालय परिवार की भरोसेमंद कर्मचारी बन गयी हूँ मै) ...... मैने कातर नजरों से देखा....................सातों के सातों पिरियड मुझे दे दिये गये थे .........फ़िर भी हिम्मत करके मेडम से कहा -----सातो पिरियड मुझे ही लेने होंगे ??? मेडम -----हाँ बच्चे बारिश में बाहर भी तो नही जा सकते ???................मै बोल पडी -------मेडम एक काम करती हूँ .......लाईब्रेरी के बदले मै हर एक क्लास में चली जाती हूँ.................कम से कम एक जगह तो नही बैठना पडेगा...............फ़िर कुछ सोच कर मेडम ने कहा--------नही तुम सिर्फ़ ११-१२ वी क्लास के बच्चों के ४ पिरियड ले लो............ठीक है ( दो पीरियड तो घूम पाउंगी मै सोचकर )..............खुश हो गयी मै...........पहली बार लाईब्रेरी में इतनी देर तक रूकना था...........(सच्ची अपनी जिन्दगी में अब तक लाईब्रेरी में कभी पढाई की हो या कुछ भी पढा हो , याद नही आया )..........खैर..........अब जब बच्चों के सामने बैठना ही था तो एक -दो पुस्तकों पर नजर डाली ---------------और नीचे के खाने में रखी एक संस्कृत की किताब पर नजर पडी-----------कुल ३ या चार साल ही संस्कृत पढी होगी मैने ..........पर बहुत मजा आता था उसके श्लोक पढकर ...सो उसी को उठाया और जो कुछ मेरे हाथ लगा .............कुछ श्लोक ( इन्हे श्लोक ही कहते है ना ?) व उनके अर्थ------ जैसा मैने समझा----------शायद आपने भी कभी पढ़े हो तो याद आ जायेगे या न पढ़े हो तो (शायद) अच्छे लगेगे ..................

१ --- हस्तस्य भूषणं दानं , सत्यं कण्ठस्य भूषणम् ।
श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं ,भूषणें किं प्रयोजनम् ॥
अर्थ --हाथ का आभूषण दान है , गले का आभूषण सत्य है , कान का आभूषण शास्त्र या अच्छा श्रवण है , तोफ़िर आभूषणो(गहनों) की क्या आवश्यकता है ?

२---उद्यमेन् हि सिद्ध्यन्ति , कार्या्णि न मनोरथै: ।
नहिं सुप्तस्य सिंहस्य , प्रविशन्ति मुखे म्रगा: ॥
अर्थ-- मेहनत करने से ही कार्य पूरे होते है , सिर्फ़ इच्छा करने से कार्य पूरे नही होते , जिस प्रकार कि सोये हुएसिंह के मुंह मे हिरण भोजन के रूप मे प्रवेश नही करता (उसे शिकार करना पडता है भोजन के लिए )।

३---यथा हि एकेन चक्रेण , न रथस्य गति: भवेत् ।
एवं पुरूषकारेण् विना , दैवं न सिद्ध्यति ॥
अर्थ् -- जिस प्रकार एक चक्के ( wheel ) से रथ की गति नही हो सकती, उसी प्रकार परिश्रम केबिना (without effort ) भाग्य ( destiny) सफ़लता नही देता ।

४---नमन्ति फ़लिन: व्रक्षा , नमन्ति गुणिन: जना:।
शुष्क व्रक्षाश्च मूर्खाश्च् , न नमन्ति कदाचन् ॥
अर्थ-- फ़लदार व्रक्ष /गुणी लोग , झुकते है/नमस्कार करते हैं , परंतु सूखे हुए व्रक्ष और मूर्ख लोग कभी नहीझुकते है ।

५--- म्रक्षिका: व्रण:मिच्छन्ति , धनमिच्छन्ति पार्थिवा: ।
नीच: कलहमिच्छन्ति , शान्ति मिच्छन्ति साधव: ॥
अर्थ-- मक्खियाँ घाव चाहती है , राजा धन चाहता है या धनप्राप्ति की ईच्छा रखता है , नीच लोग ( mean minded people ) झगडा चाहते हैं , और अच्छे लोग ( good people ) शान्ति ( peace ) चाहते है ।

६--- अक्रोधेन जयेत् क्रोधम् , असाधुं साधुनां जयेत् ।
जयेत् कदर्यं दानेन् , जयेत सत्येन चान्रतम् ॥
अर्थ-- क्रोध को ,क्रोध न करके जीतना चाहिये , दुष्ट (bad person/a wicked ) को साधुभाव (by being good ) द्वारा जीतना चाहिये , कंजूसी (miserliness ) को दान द्वारा ( by being generous ) जीतना चाहियेऔर झूठ को सत्य द्वारा (by truth , i.e. by being truthful ) जीतना चाहिये ।


ये सब उस किताब से उतारने मे कब समय बीत गया पता ही नही चला.........धन्यवाद मेडम का.........जिन्होने आज लाईब्रेरी से मुझे रूबरू करवाया..........

विशेष :--- प्रयास किया है शुद्ध लिखने का फ़िर भी कुछ मात्राएँ ( र ) की टाईप नही करना आता , इसलिये
( वहाँ गलती है --- अर्थ स्वयं लिखे है , गलती संभव है ------क्षमाप्रार्थी हूँ ।