मन ही नहीं मानता-"वो" बहुत याद आते है,
कैसे समझाऊं इसे -ये आंसू इसी की गवाही देते है,
"उन्हें" भी जाना ही था तो पूरी तरह चले जाते,
हर दम सुबह-शाम यूं याद तो न आते,
"वो" चाहे भी तो लौट क़र नहीं आ पाएंगे,
न कोई ठौर या ठिकाना ही मालूम-
जहां "उन्हें" ढूँढने हम जा पाएंगे,
लोग कहते हैं -"ईश्वर" के पास चले गए,
अब तारा बनकर नजर आयेंगे,
"उन्हें" नहीं पता- हम उन्हें कैसे देख पायेंगे?
अगर वो आकाश में हों--तो हम पंछी बन उड़ जायेंगे,
अगर वो हवा में हों-- तो हम खुशबू बन बिखर जायेंगे,
बस उनकी एक झलक जो मिल जाए--
हम सब छोड़ दौड़े चले जायेंगे ......