Sunday, May 17, 2009

मौत का मंजर

जेड गुडी की होने वाली मौत एक खबर बन गई थी । बहुत त्रासदायक होता है एक मरते इन्सान की रोजमर्रा हालत को देखना । शुक्रगुजार हूँ कि मै भारत मे पैदा हुई हूँ , जहाँ हम किसी की मौत को तमाशा नहीं बनाते वरना दिन-रात जूझते हैं कि किसी भी इन्सान को अन्तिम साँस लेने के पहले तक किस प्रकार से बचाया जाए ----
(इस कविता के बारे मे अभी कुछ भी कह पाने की स्थिति में नहीं हूँ बस पढ लिजीये । )------------


मैने मौत को अपनी आँखों से देखा है ----
मैने बहुत बार बुलाया ,
पर वो नहीं आई ,
दूर से मुझे डराती रही ,
और डराकर इतराती रही ,
मुझे डरा देख तडपाती रही ,
मै भी डरी , तडपी , पर मरी नहीं ,
फ़िर एक दिन उसने मुझे धोखा दिया ,
मुझे डराया , मुझे तडपाया ,
और " तुम्हें " ले गई ।
उस दिन मैनें मौत को देखा था ।
फ़िर कई साल गुजर गए ,
उसने फ़िर दस्तक दी ,
मैं अब भी डरी ,
अब भी सहमीं ,
मरी नहीं ।
इस बार मैने मौत को ,
अपने घर में झाँककर जाते देखा है ।

3 comments:

M VERMA said...

सुन्दर ज़ज्बात ----

vatsal said...

speechless ... i m getting goose bumps...(rongte khade hona)

गिरीश बिल्लोरे said...

साहसी व्यक्तित्व को नमन