Saturday, May 4, 2013

रे मन!...

तन की तल्लिनता को तौल कर मत निहार
मन की मलिनता को मौन हो मत स्वीकार

घन की घनिष्ठता का सुन तू घोर घर्षण
छन-छन छनकती पायल का मत रख आकर्षण

धन की धौंस से न धर धीमे से गतिरोध
जन की जड़ता का कर पुरजोर विरोध....

7 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

अँगड़ाई कुछ कर पाने की..

Sriram Roy said...

वाह प्रेरणाप्रद रचना ...अर्चना जी ...

Ramakant Singh said...

घन की घनिष्ठता का सुन तू घोर घर्षण
छन-छन छनकती पायल का मत रख आकर्षण

मन को झंकृत करती भावमय लडियां

संगीता पुरी said...

अच्‍छी है ..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति!
साझा करने के लिए आभार...!

Anju (Anu) Chaudhary said...

वाह

कालीपद प्रसाद said...

अलंकृत भाषा में सुन्दर बात कही आपने !बधाई आपको

अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
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