Monday, July 17, 2017

क्यों लड़ते हैं लोग घरों में ?

उसके घर का आने -जाने का रास्ता घर के पिछले हिस्से से होकर है ,मेरे और उसके ,दोनों घर के बीच में सामान्य अन्तर है .. बातचीत, नोक-झोंक ...सब सुनाई देता है ...
कामकाजी बहू है ..... सास और बहू दोनों ताने देने में मास्टर हैं ....

- खा-खा कर मोटी हो रही है
-इनके लिए हड्डी तोड़ते रहो तब भी चैन नहीं पड़ेगा
- काम पे क्या जाती है  ,इनके पर निकल आए हैं..
- जा बेटा ,साबुन से हाथ धोना ... तेरे लिए मैं लेकर आई हूँ  साबुन ...
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"कान पक गए" .....मुहावरा पक्के से समझ आ गया है ..... :-(

हर छुट्टी के दिन पूरा दिन ... खराब हो जाता है ...
और तो और त्यौहार भी नहीं बचते ....
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...क्यों लड़ते हैं लोग ...घरों में .....

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (19-07-2017) को "ब्लॉगरों की खबरें" (चर्चा अंक 2671) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ताऊ रामपुरिया said...

पडौसियों के मनोरंजन के लिये तो नही लडते कहीं ये लोग?:)
रामराम
#हिन्दी_ब्लॉगिंग