न गज़ल के बारे में कुछ पता है मुझे, न ही किसी कविता के, और न किसी कहानी या लेख को मै जानती, बस जब भी और जो भी दिल मे आता है, लिख देती हूँ "मेरे मन की"
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Sunday, February 7, 2016
Thursday, May 28, 2015
वीरों तुम्हें नमन
आज गिरिजा दी ने आमंत्रित किया था ... पिछले हफ्ते ही पहली बार मिले ... और आज दूसरी बार...बहुत कुछ उनसे .
सीखने को मिला ... उनकी धीमी आवाज को सुनते हुए
महसूसा कि वाणी मेँ मिठास किसे कहते हैं ....और इनकी
बनाई आलू कि कचोड़ी बहुत स्वादिष्ट थी ... धन्यवाद ...मेरे
एक दिन को यादगार बनाने के लिए ...मान्या से मिलकर भी
खुशी हुई ...उसने भी एक भजन सुनाया ,उसे स्नेहाशीष ....
और इस मुलाक़ात मे उनकी आवाज मे सुनने के लालच ने बनवाया ये पॉडकास्ट ...
सुनिए और उन्हें पढिए उनके ब्लॉग - ये मेरा जहां पर
Sunday, February 3, 2013
करना फ़कीरी फिर क्या....
सूंघ तुम पाते नहीं
वरना दूर से
खुशबू पहचान लेते
न जाने तुम्हारी आँखों से
झिल्ली भी कब उतरेगी
जो पढ़ते हो गलत समझते हो
तुम्हारे कान अब पकने लगे हैं
सड़न लग चुकी है उसमें
मधुर संगीत भी तुम्हें
अब कर्कश लगता है -
चिड़िया को गाने से रोकना
यानि तुम्हारे कान का
इलाज भी बाकी है .....
खुद गा पाना
तुम्हारे बस का नहीं
चिल्ला-चिल्ला कर
गला खराब कर चुके हो
बस एक छू सकते हो
मुझे जबरन
लेकिन वो भी
ज्यादा दिन तक नहीं
छू पाओगे ...
मेरे नये पंख अब
उगने लगे हैं
मजबूत वाले .....
घने लम्बे और सफ़ेद....
Tuesday, October 16, 2012
Thursday, August 9, 2012
स्याम म्हाने चाकर राखो जी...
प्रस्तुत है मीराबाई की एक रचना- (स्वर-अर्चना)...
स्याम म्हाने चाकर राखो जी,
गिरधारी लाला म्हाने चाकर राखो जी।
चाकर रहस्यूँ बाग लगास्यूँ, नित उठ दरसण पास्यूँ।
बिंदरावन री कुँज गली में, गोविंद लीला गास्यूँ।
चाकरी में दरसण पास्यूँ, सुमरण पास्यूँ खरची।
भाव भगती जागीरी पास्यूँ, तीनूँ बाताँ सरसी।
मोर मुकट पीतांबर सौहे,गल वैजंती माला।
बिंदरावन में धेनु चरावे,मोहन मुरली वाला।
उँचा-उँचा महल बणावं बिच-बिच राखूँ बारी।
साँवरिया रा दरसण पास्यूँ,पहर कुसुंबी साड़ी।
आधी रात प्रभु दरसण दीज्यो, जमनाजी रे तीरां।
मीरा रा प्रभु गिरधर नागर,हिवड़ो घणो अधीराँ।
- मीराबाई
Sunday, February 19, 2012
Tuesday, December 14, 2010
गीत फ़िरदौस का --स्वर मेरा--अर्चना चावजी
एक गीत फ़िरदौस की डायरी से..
तुमसे तन-मन मिले प्राण प्रिय! सदा सुहागिन रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
राधा कुंज भवन में जैसे
सीता खड़ी हुई उपवन में
खड़ी हुई थी सदियों से मैं
थाल सजाकर मन-आंगन में
जाने कितनी सुबहें आईं, शाम हुई फिर रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
तड़प रही थी मन की मीरा
महा मिलन के जल की प्यासी
प्रीतम तुम ही मेरे काबा
मेरी मथुरा, मेरी काशी
छुआ तुम्हारा हाथ, हथेली कल्प वृक्ष का पात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
रोम-रोम में होंठ तुम्हारे
टांक गए अनबूझ कहानी
तू मेरे गोकुल का कान्हा
मैं हूं तेरी राधा रानी
देह हुई वृंदावन, मन में सपनों की बरसात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
सोने जैसे दिवस हो गए
लगती हैं चांदी-सी रातें
सपने सूरज जैसे चमके
चन्दन वन-सी महकी रातें
मरना अब आसान, ज़िन्दगी प्यारी-सी सौगात ही गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
-फ़िरदौस ख़ानWednesday, September 29, 2010
Thursday, September 2, 2010
जन्माष्टमी पर्व पर एक भजन ----मुरलीधारी -दिन भर करिये /सुनिए /पढ़िए
जय श्री कृष्ण ...
आज ये भजन प्रवीण पाण्डेय जी के ब्लॉग से--------सुनिए
आज ये भजन प्रवीण पाण्डेय जी के ब्लॉग से--------सुनिए
और यहाँ पढ़िए ....न् दैन्यं न् पलायनम
और यहाँ सुनिए गिरीश जी के आलेख के साथ रचना के गाये स्त्रोत्र ...
और यहाँ सुनिए गिरीश जी के आलेख के साथ रचना के गाये स्त्रोत्र ...
Sunday, April 11, 2010
इसे दोहराने की जरूरत लगती है ...इस पर अमल करने की कोशिश करें........एक भजन जो हम गाते है...
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(मैने व रचना ने गाया है )
"भला किसी का कर न सको तो , बुरा किसी का मत करना,
पुष्प नहीं बन सकते तो तुम , काँटे बनकर मत रहना ।
बन न सको भगवान अगर तुम , कम से कम इंसान बनो,
नही कभी शैतान बनो तुम , नही कभी हैवान बनो,
सदाचार अपना न सको तो पापों मे पग न धरना ,
पुष्प नहीं बन सकते तो तुम , काँटे बनकर मत रहना ।
भला किसी का कर न सको तो ............
सत्य वचन न बोल सको तो, झूठ कभी भी मत बोलो,
मौन रहो तो भी अच्छा है , कम से कम विष मत घोलो,
बोल यदि पहले तुम तोलो, फ़िर मुँह को खोला करना ,
पुष्प नहीं बन सकते तो तुम , काँटे बनकर मत रहना ।
भला किसी का कर न सको तो ............
घर न किसी का बसा सको तो , झोपडियाँ न ढहा देना,
मरहम -पट्टी कर न सको तो , क्षार-नमक न लगा देना,
दीपक बनकर जल न सको तो , अँधियारा भी मत करना,
पुष्प नहीं बन सकते तो तुम , काँटे बनकर मत रहना ।
भला किसी का कर न सको तो ............ "
Wednesday, October 14, 2009
भजन....
जीवन की एक कडवी सचाई.................
मीराबाई का एक भजन...............
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मीराबाई का एक भजन...............
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Saturday, August 8, 2009
रावणकृत तांडव स्त्रोत्र ..........


पिछले सोमवार कंप्यूटर ख़राब होने कि वजह से पोस्ट नही कर पाई थी आज कीजिये ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन और मन्दिर के कुछ द्रश्य नर्मदा तट से ................................साथ ही सुनिए मेरे भाई देवेन्द्र द्वारा गाया गया -----"रावण कृत तांडव स्त्रोत्र"..........................(सारे चित्र गूगल से साभार ...)


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Tuesday, July 28, 2009
शिव -स्तुति.................कल नही तो आज सही...........
कल बहुत कोशिश के बाद भी ये स्तुति पोस्ट नही कर पाई थी.............लोड ही नही हो पा रही थी .......खैर कोई बात नही ....कल नही तो आज सही.....................सुनिये ये शिव स्तुति..................
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Monday, July 20, 2009
दर्शन व भजन करें श्रावण सोमवार पर

श्रावण माह के इस सोमवार पर दर्शन किजिये भगवान महांकालेश्वर-------उज्जैन (मध्यप्रदेश)--के----(चित्रगुगल से साभार )................
.........और सुनिये मेरी आवाज में गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित श्री रामचरितमानस ग्रन्थ के उत्तरकांडके दोहा नम्बर १०७ की ये प्रार्थना........
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इस प्रार्थना के साथ मेरी , बल्कि हम सब भाई-बहनो की बहुत ही मधुर यादे जुडी है----बात तब की है जब मै ८-९ साल की रही हूँगी--- हर साल श्रावण माह में , हमारे यहाँ खरगोन में , हमारे समाज की धर्मशाला मे गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस का नवान्ह्पारायण का पाठ होता था । हमारे पिताजी हमें वहाँ रोज नियम से ले जाते थे ,परिवार के सभी सदस्यों का वहाँ जाना अनिवार्य था , हम सुबह ४ बजे से उठकर , नहाकर चाँदनी के फ़ूल तोडकर खूब सजाकर लम्बी-लम्बी माला बनाते थे और पिताजी के साथ ही मोटरसाईकिल पर जाने को तैयार हो जाते थे , ६ बजे तक पहुँच जाना होता था , ( भाई -बहनों मे से जो जल्दी तैयार होते वही पिताजी के साथ जा पाते ) , माँ भी आधा खाना पकाकर बाद मे आती थी---जो जल्दी पहुँचता था उनकी माला मुख्य-फ़ोटो पर चढाई जाती थी ---इसलिये हर घर के बच्चों में होड लगी रहती थी-----और माला चढाई जाने पर जो खुशी मिलती थी उसे शब्दों मे बयान नही किया जा सकता---- हमें बहुत सारी प्रार्थनांए वही से मुखाग्र है----अध्यात्म शब्द से हमारा दूर-दूर तक का कोई रिश्ता नही था बस आनन्द आता था , पाठ के बीच में एक इन्टरवल होता था जिसमें सबको मसाले वाली चाय पीने को मिलती थी जिसका स्वाद आज तक याद है ---- वह भी एक बहुत बडा आकर्षण होता था..........रामायण पढने वालो के लिए (बहुत लोग तो शायद उसी बहाने आते थे) ------१०--साढे १० बजे तक रोज का पाठ समाप्त होने के बाद वापस आकर भी रोज स्कूल जाते थे बिना नागा ! ! ! आखरी दिन समाप्ति के दिन महाप्रसाद होता था ।
अब समय बहुत बदल गया है वो दिन तो अब वापस नही आ सकते मगर आज भी हमारी कोशिश है कि हमारे बच्चो को घर में वही माहौल मिले इसलिये जब भी हम इकठ्ठे होते हैं प्रार्थनाएं जरूर करते हैं.........
Monday, July 13, 2009
एक महत्वपूर्ण सूचना ------------
अगर समयाभाव के कारण मंदिर नही जा पाये हो तो ------दर्शन करे घर बैठे ---
सोमवार ख़त्म होने से पहले एक भजन कर ले ---हमारे साथ ------
सोमवार ख़त्म होने से पहले एक भजन कर ले ---हमारे साथ ------
ॐ नमः शिवाय ! ! ! ! !
कुछ दिनों पहले मैंने अपनी नासिक यात्रा के दौरान , त्रयम्बकेश्वर की पहाडी पर लिए गए गुप्त गंगा के चित्र दर्शन करवाए थे |आज श्रावन माह का पहला सोमवार है इस अवसर पर मेरे व रचना के गाये शंकर जी के इस भजन को सुनिए और आनंद लीजिये ---------- भक्ति रस का --------------
विशेष ---गलतियों पर ध्यान न देकर ,भावनाओं पर ध्यान दीजियेगा |
विशेष ---गलतियों पर ध्यान न देकर ,भावनाओं पर ध्यान दीजियेगा |
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