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Wednesday, July 20, 2016

एक चिठ्ठी बेटी के नाम। ..



 प्रिय रानू ,
स्नेह। .. ....
कहाँ से शुरू करूँ समझ में नहीं आ रहा...   कुछ ख़ास बातें बताना है तुम्हें  ... तुम्हारा जन्म हुआ नानी के घर

  

और रानू नाम दिया इन आंटीजी ने ,जो रांची में हमारी मकान मालकिन थी 










.... अपने पापा की लाडली बेटी हो तुम ,वैसे तो सब लड़कियां अपने पापा की लाडली होती है मगर तुम ख़ास इसलिए कि --

५ साल की उम्र बहुत कम होती है पापा के हाथ से खाई दाल में चूरी रोटी के स्वाद को याद रखने की।





 .. हां पांचवां जन्मदिन मनाने के एक दिन पहले ही उन्हें चले जाना पड़ा था  ... लेकिन जिस बहादुरी से तुमने भैया के साथ मिलकर आगे कदम बढाए उसकी प्रशंसा पाने की हकदार हो  ...


"भैया के साथ मिलकर आगे कदम बढाए"  लिखने पर तुम दोनौं की सारी कारस्तानियां आँखों के सामने से गुजर रही है  ....











के. जी. टू  में थी तब हमें नागपुर आ जाना पड़ा था। पापा को पलंग पर लेटे  देखकर पूछा करती थी -पापा कब ठीक होंगें? और उत्तर जानते हुए भी मैं कह देती -- हो जाएंगे। ..

फिर जब हम नाना के घर वापस लौटे तो तुम तीसरी कक्षा में आ गयी थी  अब तक टाटपट्टी बिछाकर उसपर बैठकर पढ़ाई करने वाला स्कूल तुम दोनों ने पहली बार देखा था। . ..

 ...... पूरे ननिहाल के गाँव को तुम दोनौं का बचपन अब भी भुलाए नहीं भूलता। ..















पांचवी में  थी तब हम इंदौर (हॉस्टल) में आ चुके थे .... .. १९९८ में तुम्हारा दसवां जन्मदिन मनाया था हॉस्टल की मेस में। .... पूरे पांच साल बाद  .......

छठी कक्षा की क्लास टीचर "नाग मेडम" को मैं भी नहीं भूली हूँ। .  :-)

सातवीं में तुम स्काऊट -गाईड के केम्प में नेपाल गई थी। ....

आठवीं में जब तुम आई तो सरला सरवटे मेडम के प्रोत्साहन से गोताखोरी सीखनी शुरू की। ... और राष्ट्रीय गोताखोरी प्रतियोगिओं में भागीदारी की ...नौंवी। .दसवीं और ग्यारहवीं तक। ...




यहीं  से अपना खिलाड़ियों वाला रिश्ता मजबूत हो गया। ...... याद होगा  जब ४०० मीटर रिले-रेस की हिस्सा थी और १०० मीटर में भी दौड़वा दिया था नवीन सर ने .....

बारहवीं में तीन महीने तक हम सबके बहलावे में आकर साइंस विषय लिया  .....लेकिन तुम्हारा मन नहीं माना   ..... और मन की जीत हुई   .... कॉमर्स  विषय लेकर गोताखोरी को भी अलविदा कर दिया तुमने  .....

इन तीन सालों में मैं और तुम दो सदस्य रह गए थे घर में। ..भैया जा चुका था अपना आसमान तलाशने। ... और इन्हीं दिनों हमने खूब मस्ती की। ... इंदौर सराफा से लेकर छप्पन तक  ..कुछ नहीं खाने का बचा जिसका स्वाद न लिया हो। ...  :-)

इन्हीं दिनों तुमने स्कूटर सीखा और बाजार से सामान-लाने का काम तुम्हारे जिम्मे हो गया   ..... भैया के कॉम्पिटेटिव एक्ज़ाम के फ़ार्म भरना कैसे भूल सकते हैं हम। ....


फिर सफर शुरू हुआ तुम्हारा घर से बाहर का जब स्नातक की पढ़ाई के लिए पूना गई तुम    ..... तुम्हारा ये कहना कि -अगर मैं बारहवीं पास कर लुंगी तो भैया जैसे मुझे भी भेज दोगी न बाहर पढ़ने रोकोगे तो नहीं। .... मुझे भी मजबूत   बनाता गया। .....



और ... तुम्हारे जीवनसाथी चुनना और सबकी सहमती लेने के फैसले का पूरे  परिवार ने सम्मान किया  ....






वैवाहिक जीवन में भी तुमने बहुत ही जल्दी सबको सम्भाल लिया   ....

नए रीति -रिवाज ,खान-पान और परिवार को समझने का मौका ही नहीं दिया ईश्वर ने  ... केदारनाथ हादसे में तुमने ही नहीं हम सबने भी असमय ही अपने परिजनों की खो दिया। .......

लेकिन जिस दृढ़ता से उस घड़ी में तुमने अपने आप को संयत रखा जीवन भर तुम्हारा हौसला और साहस वैसा ही बना रहे ये मेरा आशीष है  .....

और हाँ तुम्हारे रसोई प्रेम का उल्लेख करे बिना ये चिठ्ठी अधूरी है  ..... मैंने तुम्हैं कुछ नहीं सिखाया लेकिन तुम्हारे खाना-पसंद मामाओं और बढ़िया खाना बनाने वाली मामियों की मदद से तुम बहुत अच्छे कुक बन गयी हो। ...

जिसमें अगर मैं ---सुमुख-निशी-चिंकी का नाम न लूँ तो वे बुरा मान सकते हैं। ... :-) वत्सल भैया इन सबसे वंचित रह गया लेकिन अब तुम उससे टक्कर ले सकती हो ,बहुत टेस्टी खाना  बना कर मुझे खिलाता है। .. :-)

.... नीलेश और दिप्ती ने भी तुम्हारी रसोई में स्वाद बढ़ायें हैं  ... अब आती हूँ कान्हा पर उसने तुममें वात्सल्य की पहचान कराई तुम अपनी मामियों की तरह ही उसकी चहेती मामी हो  ....

और अब हमारी "मायरा" रानी तुम एक तो वो सवा है ,तुम उन्नीस तो वो बीस ,





....... अभी से मुझे "आंटी " कहकर चिढ़ाती है :-)




जन्मदिन मनाना कोई तुमसे सीखे। ....
एक महीने पहले से एक महीने बाद तक बधाई मिलती रहे हमेशा की तरह। ....  और गिफ्ट मिले तो सोने पे सुहागा। ... :-)





...... वैसे ये तुम्हारा कौनसा जन्मदिन है। .. :-)  :-) पूछ रहे हैं  वत्सल -नेहा और दे रहे हैं जन्मदिन की बधाई और स्नेहाशीष ! ...







गिफ्ट भी मिल जाएगा। . "सेरा"से मिलना न भूलियो !!!

Monday, January 18, 2016

सालगिरह

चौथी वर्षगाँठ

बहुत से उतार-चढ़ाव पार हुए
बहुत से कर पाएंगे
आपके आशीष से

Wednesday, November 25, 2015

टू, भगवान जी

कुछ लिखते नही बन  रहा ...
..ये चिट्ठी हाथ में आई एक पुराने पर्स को फेंकने के लिए खाली करते समय....सुनिल के एक्सीडेन्ट के बाद की चिट्ठी है बेटि ने लिखी है ..........तब मेरे बच्चों के मन में क्या चल रहा था ....इस चिट्ठी ने सब कुछ सहेज लिया......तब पल्लवी पहली और वत्सल चौथी कक्षा में होगा.....
सुनिल अन्कॉन्शस रहे करीब साढे तीन साल ... उस समय मेरे पास समय नहीं रहता था बच्चों के साथ बिताने के लिए ...
भगवान जी पर भरोसा !...
अब भी है ,मुझे भी ...










आज शादी की ३१ वीं सालगिरह पर ये उपहार आपके लिए .....

Sunday, June 1, 2014

पंख लगा समय भागा...

समय तो निकल ही भागता है
हाथों से फिसलकर
ज्यों फिसल जाती है रेत
और टपक जाता है हर लम्हा
ज्यों टपकती है बूँद पानी की हाथों से
रह जाते हैं निशाँ
गहरे होकर
हादसे से हुए जख्मों के
क्यों कि
रिसता रहता है घाव
हर संवेदना व्यक्त करने वाले के साथ
मोमबत्ती जलाने से टपका मोम
हरा रखता है जख्मों को
या फिर कई और तरीके भी तो हैं...
समाचार बनाने के ...
कड़े शब्दों में निंदा करना
बहुत आसान होता है
या फिर
बस एक ट्वीट
फिर "केदार" पूजे जाएंगे ही
और बहा ले जायेगी गंगा
सारे अस्थिपंजर इस बार
बाँट दिए गए हैं मुआवजे
सोलह जून केे
जारी हो गए मृत्यु प्रमाणपत्र
हो चुके हैं चुनाव
आई पी एल भी उफान पर है
डाक्टरों की भी जांच जारी है
शिक्षा डिग्री की होती है
संस्कारों की नहीं ...
.
.
.
मगर "मायरा"
मेरी बच्ची ! तुम
कब बड़ी हो जाओगी
अपनी मम्मी की तरह..
ये बता पाना मुश्किल होगा
किसी के भी लिए
क्योंकि
समय तो निकल ही भागता है
हाथों से फिसलकर .......
-अर्चना
(फोटो - मम्मी-पापा के साथ मायरा और पल्लवी (मायरा की मम्मी) मायरा की नानी के साथ )


Tuesday, October 29, 2013

चोट्टी लड़की ....


  
चित्र में जस्टिस पी. डी. मुल्ये जी से पुरस्कार प्राप्त करते हुए पल्लवी

गुलाबी जाड़े  के आते ही याद आ जाता है ये गुलाबी स्वेटर ....
होस्टल में रहते हुए बहुत मेहनत से बनाया था बेटी पल्लवी के लिए मैने ...एक तो समय बहुत कम मिलता था होस्टल में बच्चों की दखरेख के बीच ...काम भी नया था ..... स्कूल इन्दौर के बाहरी भाग में था तो ठंड भी बहुत ज्यादा लगती थी , बुनाई का शौक तो पहले से ही था , सुनील ने पहले जन्मदिन पर तीन किताबें भेंट में दी थी उसमें से एक स्वेटर की डिज़ाईन की भी थी ....
इस बीच वक्त कुछ ऐसा बीता कि बहुत दिनों तक हाथ ही नहीं आया ...फ़िर आया भी तो खुद को बच्चों के बीच होस्टल में पाया था मैंने ....
जब स्वेटर बनाने का खयाल मन में आया तो वही आदत कुछ अलग हटकर करने की ...और दो किताबों की डिज़ाईन से देखकर फ़्रिल वाला ये कार्डिगन बनाया था ....पल्लवी खिलाड़ी रही तो इस स्वेटर के कंधे पर दो स्केट्स लेस से बंधे लटकते हुए बनाए थे ,वो भी बुनकर ...किसी किसी लाईन में हर फ़ंदा अलग-अलग रंग का भी बुनना पड़ा था .......
बहुत तारीफ़ बटोरी थी इस स्वेटर ने .....
बात तब की है जब पल्लवी ने बी. बी. ए. की पढा़ई के लिए पूना के एम. आई. टी . कॉलेज में प्रवेश लिया था , मैं उसे पहली बार छोड़ने ले लिए साथ गई थी ,हमने उसके रहने के लिए कई होस्टल और कमरे देखे लेकिन पहली बार उसे अकेले रहने के लिए छोड़ना मुझे चिंतित कर रहा था ....कुछ बड़ी लड़कियों के साथ रहने से उसे पढ़ाई में मदद मिलेगी और अकेले रहने का डर भी दूर होगा ये सोच कर अन्त में एक लड़कियों का होस्टल तय किया जहां सारी लड़कियां जो एम .बी. ए. कर रही थी रहती थी ...ये अकेली बी. बी. ए की और उम्र में छोटी थी ...छह: महिने सब कुछ अच्छा रहा ..... प्रथम सेमिस्टर खतम हुआ ...आखरी पेपर के दूसरे दिन उसे इन्दौर वापस आना था ...उन्हीं दिनों उसका जन्मदिन भी आकर चला गया था ....
उसकी कुछ दोस्तों ने आखरी दिन पार्टी रखी ...उसमें जाने के लिए यही स्वेटर उसने पहना ..... लेकिन ये याद आते ही कि केक काटने के बाद सब  चुपडे़गे भी और कहीं स्वेटर गन्दा हो  गया तो .... उस मासूम ने तुरत -फ़ुरत निकाल कर वहीं छोड़ दिया पलंग पर .....और ....जब लौटी तो कोई उसका स्वेटर तो स्वेटर ...वो पूरी ड्रेस ही चुरा कर ले गया था ....जो उसने पलंग पर छोड़ दी थी ... :-(

फोन पर उसकी दर्द भरे भारी मन से स्वेटर चोरी की दासतां सुनाने की आवाज आज भी गूंजती है- मेरे कानों में....
और हर साल इस गुलाबी जाड़े में याद आता है उसे गुलाबी स्वेटर माँ का बुना , जिसके हर फ़ंदे में दुआ बुनी थी मैंने .........
 खैर दुआ किसी के तो काम आ रही होगी ....  वो लड़की भी कभी हमें नहीं भूलेगी इस स्वेटर को पहनते हुए ...बस यही खयाल जाडे़ मे गरम अहसास दे जाता है हमें ..... चोट्टी लड़की नाम रखा है मैंने उस स्वेटर सहेजने वाली का .... जो एम. बी. ए. पास कर चुकी होगी कब की ....... 
शायद मुझे पूना में कहीं किसी मोड़ पर मिले ..... तो दौड़ कर माथा चूम लूंगी उसका ...... :-)


Friday, January 18, 2013

शुभकामनाएँ

                                                                 १८ जनवरी २०१३
                                                शादी की प्रथम वर्षगाँठ पर ढेर सारा प्यार! 

                      हार्दिक बधाई,शुभकामनाएँ और शुभाशीष- सफ़ल दाम्पत्य जीवन के लिए....



कभी मेरे आँगन उतरते हो तुम
तो कभी तुम्हारे आँगन में मैं
चुगते हैं दाना
चहचहाते हैं खुशी से...

कभी मेरे संग खिलते हो तुम
तो कभी तुम्हारे संग में मैं
महकाते हैं चमन
खो जाते हैं एक -दूजे में...

मैं जो साथ न पाउँ तुम्हारा
या कभी तुम न पाओ मेरा
तो हमेशा अधूरे रहोगे तुम
और तुम्हारे बिना मैं...

आँख से जब मैं कहूँ
दिल से तुम्हें सुनना होगा
एहसासों के तागों से
प्रेम का डोरी बुनना होगा....


एक तोहफ़ा तुम्हारे लिए -






गीत राजेन्द्र स्वर्णकार जी का लिखा है ...

Wednesday, December 5, 2012

फ़ेरे...

इस गीत के साथ देखिये बेटी पल्लवी की शादी के फोटो की स्लाईड--




और एक गीत मेरी पसन्द का --...तेरा मेरा साथ रहे...

Friday, February 24, 2012

समारोह 4 - गॄहशान्ति और मंडप


दिनाक 18 जनवरी को हुई रस्मों के कुछ यादगार पल ----पल्लवी   
                                                                       

वत्सल--


गीत नहीं मिल रहा था ..तो सलिल भैया को आवाज लगाई और भैया हाजिर गीत लेकर......... भैया की विशेष रूप से आभारी हूँ...

Thursday, February 9, 2012

समारोह 3-- गणेश पूजा और हल्दी..

गणेश पूजा और हल्दी की रस्म हुई 18 को....
इस गीत को सुनते हुए स्लाईड देखिये और आशीष दें आपका भी दोनों बच्चों को .... पिछली पोस्ट में शिकायत मिली थी कि कुछ लोग स्लाईड नहीं देख पा रहे ....तो नया तरीका इस्तेमाल किया है भारतीय एक्सपर्ट का ....