आगे बढ़ते रहो कि "जहां" तुम्हारा है ,
रत्न गढ़ते रहो कि "जहां" तुम्हारा है,
तन और मन की हो जुगलबंदी ऐसी --
कि हर कोई तुमसे पूछे -- " "जहां" तुम्हारा है" ?
लम्बा लेख या लम्बी कहानी पढ़ने से हमेशा से परहेज रहा है मुझे,खुद भी ज्यादा लम्बा लिख नहीं पाती....अगर लिखा भी होगा तो वही जिसे किसी को पढ़वाना नहीं चाहती।
"गीता" भी नहीं पढ़ी... बस पढ़ा तो "गीता-सार".....जिसे समझने में "अर्जुन की आँख और मछली" की कहानी याद आई,और युधिष्ठिर की भी--जिसमें वे कहते रहे पाठ याद नहीं हुआ।.....
कुछ दिन पहले एक पोस्ट लिखी थी आभासी रिश्तों के बारे में.....................और दूसरे ही दिन एक आभासी मित्र की पोस्ट की चोरी के बारे मे पढ़ा एक ब्लॉग पर......तबियत तो बहुत खराब थी पर मन नहीं माना..............उस पोस्ट की रिकार्डिंग की अपनी आवाज में ...................
अब ये सुनवाना था उनको जिनकी कि वो पोस्ट थी ......पर मेल आई डी न होने से उनके ब्लॉग पर सूचना दी..............तुरंत जबाब मिला साथ ही मेल आई डी भी.......फ़िर क्या था अनुमति लेने के लिए कि उनकी अनुमति हो तो ये पोस्ट उनको सुनवाना चाहते है जिनके बारे मे हैं..........एक मेल किया .....तबियत बहुत खराब है ---रहा नहीं गया...पोस्ट पढकर पर आप तो सुनिये .......बस फ़िर क्या था हुआ इस आभासी दुनिया का चमत्कार....................एक पॉड्कास्ट का मिला उपहार.......और बस ...हो गई एक नई पोस्ट तैयार......और आज बना फ़िर एक नया रिश्ता..........अभासी ......तो ......नहीं ही है .........
जी हाँ कल जिस आवाज को किसी ने पहचाना और किसी ने नही वो सलिल भाई की ही आवाज थी......जी हाँ सलिल भाई की .....
एक तो ---नए साल की पहली पोस्ट .....................अऊर दूसरे वो भी चुराई हुई............ऊ का कहते हैं ------चोरी त चोरी ऊपर से सीनाजोरी............. तनि सुनियेगा तो.......अऊर बूझ सके तो बताइयेगा तो------------- ई ---आवाज ...................कहीं सुना है का-----------किसका है ?