Monday, September 27, 2010

खेल-खेल में मेरी एक कविता बच्चों को समर्पित...

आज किसी की नहीं मेरी एक कविता मेरे स्वर में सारे बच्चों को समर्पित--




एक प्रेरणादायक प्रसंग यहाँ भी 

13 comments:

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

खेल और पढाई की दोस्ती अच्छी है।

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

पढाई ने हमेशा खेल को ही हराया है।
खेल की उंगली और पढाई का हाथ थाम लेना।

रिकार्डिंग में कुछ रुकावट है बीच बीच में।

Girish Billore Mukul said...

वाह
अदभुत

Udan Tashtari said...

खेल की उंगली और पढाई का हाथ थाम लेना।

रचना के माध्यम से बच्चों को बहुत प्यारा संदेश दिया...बधाई.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपके स्वर में बच्चों को समर्पित कविता तो
बढ़िया ही होगी!
--
मगर मेरे यहाँ प्लेयर खुल ही नही रहा है!

संजय कुमार चौरसिया said...

achchhi kavita hai

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी कोमल व सुन्दर कविता।

शरद कोकास said...

बच्चो के लिये लिखना बहुत ज़रूरी है

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर केल खेल मै ही पढाई भी, धन्यवाद

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

अपनी बिटिया को यह कविता बैठ कर सुनवाई,
इसे भी यह सीख पसंद आई,
बोली, बुआ ने यह कविता पढकर सुनाई है
यह सीख तो हमारे बड़े काम आई है.
खेल की उँगली थामे, प्रकृति की गोद में बैठे
पढाई का हाथ कभी नहीं छोड़ेंगे,
इतिहास के पन्नों में अगर दर्ज नहीं हो पाए
तो क्या
हम एक नया इतिहास ही रच देंगे
हम एक नया इतिहास ही रच देंगे!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत बढ़िया रही यह सीख भरी कविता!
--
आज प्लेयर खुल गया!

Archana Chaoji said...

शुक्रिया सुनने के लिए समय देने का...
@सलील भाई साहब आभारी हूँ आपकी इस आत्मीय रिश्ते के लिए...बिटिया को स्नेहाशीष...और नया इतिहास रचने के लिए शुभकामनाएं...

राजीव तनेजा said...

रोचक एवं प्रेरक बाल कविता