Saturday, September 25, 2010

बस एक झलक ...

ना मालूम उसका
मेरी गली में फिर आना हो ना हो
या मेरा ही कभी 
उसके घर जाना हो ना हो
मिल लूँ बस एक झलक 
पलक झपकते ही उसे
शायद फिर कभी 
पलक झपकने का बहाना हो ना हो ...

10 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आशा का सन्देश देती हुई!
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बहुत खूबसूरत क्षणिका है!

राजीव तनेजा said...

"मिल लूँ बस एक झलक पलक झपकते ही उसे...
शायद फिर कभी पलक झपकने का बहाना हो ना हो "

बहुत बढ़िया

संजय भास्कर said...

हमेशा की तरह ये पोस्ट भी बेह्तरीन है
कुछ लाइने दिल के बडे करीब से गुज़र गई....

सतीश सक्सेना said...

बेहतरीन भाव ...हर एक दिल में कभी न कभी ऐसी भावनाएं जागती हैं ! दिल से निकली हुई आवाज लगती है यह !

ali said...

बहुत बड़ी ख्वाहिश है आपकी ...एक झलक में फलक भी समेट सकते हैं हम अपने अंतर्मन में !

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

अर्चना जी,
आप पलक झपकने का बहाना सोचियो कईसे सकती हैं, यहाँ तो लोगों का कहना है कि
कागा सब तन खाइयो, चुन चुन खाइयो माँस
दो नैना मत खाइयो, जिन्हे पिया मिलन की आस!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

राज भाटिय़ा said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति.धन्यवाद

mahendra verma said...

इस छोटी सी कविता में पूरा उपन्यास समाया हुआ है। ...बहुत सुंदर कविता।

वन्दना said...

वाह क्या बात कह दी………………गज़ब कर दिया।