Friday, May 20, 2011

बस कहे देती हूँ ...

मेरा लिखा मत पढ़ना तुम,
मै तो बस लिख देती हूँ "मेरे मन की",
मुझे ये भी पता है ,तुम न मानोगे,पढोगे,फिर कुछ कहोगे,

और फिर यही वजह होगी अपनी अनबन की........

14 comments:

Udan Tashtari said...

अब अनबन ही सही..मगर पढ़ लिया. :)

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

मै तो बस लिख देती हूँ "मेरे मन की",

बहुत सुंदर ..... हाँ पढ़कर ही कुछ कहेंगें ... पर अनबन न होगी...

M VERMA said...

मन की लिखी शायद इस अनबन को कम भी कर दे.

संजीव said...

मन की बातें जब शब्‍द बने तब कविता.

रश्मि प्रभा... said...

anban ka adhhar ek disha deta hai ...pareshani kis baat ki

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

वैसे अनबन की बात सटीक कही है ..

क्यों की मुझे लगता है की यह बात आपने अपने हमसफ़र के लिए कही है :):)

संजय भास्कर said...

आपके मन की कविता पढ़ कर बहुत अच्छा लगा

संजय भास्कर said...

सुन्दर शेली सुन्दर भावनाए क्या कहे शब्द नही है तारीफ के लिए .

संजय कुमार चौरसिया said...

अब अनबन ही सही..मगर पढ़ लिया

Kailash C Sharma said...

जब तक पढेंगे नहीं तो मन की बात समझेंगे कैसे..और प्यार में अनबन तो होती ही रहती है..बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति..

प्रवीण पाण्डेय said...

बन ठन कर अनबन भी निकली।

ललित शर्मा said...

NAHI PADHA MAINE......

.....SACH ME..........

एस.एम.मासूम said...

अनबन से क्या डरना यह तो दिनचर्या है हर दिन की

anika said...

Bahaut acchaa likha hai