Tuesday, May 24, 2011

एहसास...

पहले नजरे भी मुझे चुभा करती थी ,
अब चेहरा ही ऐसा नहीं की देखे कोई,
कीलो के भी चुभने का एहसास नहीं होता,
अब चाहे जितनी नजरे गड़ा ले कोई ||

2 comments:

Kailash C Sharma said...

बहुत खूब!

M VERMA said...

नज़रो के कील .. एहसास के धरातल पर