Tuesday, October 6, 2015

एक मुलाक़ात बरसों की

हम जो सोचते हैं वो होता नहीं, और जो होता है वो हम सोचते नहीं....
इस बार बहुत पहले से तय था की 3 माह की छुट्टी लेकर वत्सल के साथ बंगलौर में रहूँगी ...जब ये बात सलिल भैया....चला बिहारी फेम .......को बताई तो कहने लगे ...इस आभासी दुनिया में एक उम्मीद थी की इंदौर रहोगी तो कभी न कभी मुलाक़ात होगी मगर बंगलौर यानि ....मुश्किल!
...पर होना तो कुछ और ही लिखा था ...पारिवारिक कार्य से गांधीनगर जाना पड़ा और जब ये खबर भैया को दी....तो पट से बेग उठाया ..मौके को भुनाया और भाभी संग मिलने चले आए ...भावनगर से अहमदाबाद .......और वहां से गांधीनगर तक मैं लिवा लाई.....
दिन बिताया साथ में गप्पे लड़ाते.....खाने में तो ज्यादा कुछ खातिरदारी कर नहीं पाई .....पर मिलने मिलाने में कसर बाकि न रही......
दो यादगार मुलाकातें मेरी यादों का हिस्सा बनी ...एक तो आप जान गए ....
और दूसरी.....आनंद से ......उसके बारे में विस्तार से फिर कभी....

9 comments:

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

अब ये संयोग था या विधि का विधान... जो भी था मधुर था... हमने एक दूसरे को देखा, मिले, बतियाये और फोटो खिंचवाई. लेकिन पहली बार भाभी ने बहुत एन्जॉय किया. लगा ही नहीं कि किसी से पहली बार मिल रही हैं! माँ से मिलना भी बड़ा सुखद रहा! सचमुच यादगार!

संजय भास्‍कर said...

एन्जॉय

संजय भास्‍कर said...

एन्जॉय

शिवम् मिश्रा said...

जय हो ... :)

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, उधर मंगल पर पानी, इधर हैरान हिंदुस्तानी - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

प्रतिभा सक्सेना said...

अनायास बन गए रिश्ते बहुत मधुर होते हैं !

देवेन्द्र पाण्डेय said...

आनंद दायक

देवेन्द्र पाण्डेय said...

आनंद दायक

Mukesh Kumar Sinha said...

कुछ रिश्ते ऐसे ही खिलखिलाते रहें ......... शुभकामनायें !