Thursday, April 20, 2017

अंगूठा




कभी अंदर 
कभी बाहर 
अंगूठा होता है- हस्ताक्षर 

कभी दर्पण 
कभी अर्पण 
अंगूठे में होता है- समर्पण 

अंगूठा होता है- एकलव्य 
कभी श्रव्य 
कभी द्रव्य 
कभी भव्य 


अंगूठे से बनता है - कोई विशेष 
तो कोई 
रहता है शेष। .. 

अंगूठा करता है-
किसान ,लेखक के कर्म 
समझता है -उनका मर्म 


अंगूठा होता है-
उँगलियों की जान 
हाथों की शान 
कभी अपमान 
कभी सम्मान 

और अब अंगूठा ही है -
आपकी 
मेरी,
सबकी पहचान !


-अर्चना 


4 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "काम की बात - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (23-04-2017) को
"सूरज अनल बरसा रहा" (चर्चा अंक-2622)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Kavita Rawat said...

अब अँगूठे में है सबकी कुंडली
बहुत सुन्दर

प्रतिभा सक्सेना said...

बहु आयामी हो गया है आज तो अँगूठा.