Saturday, April 1, 2017

आ लगा किनारा

मेरे गाँव की नदी
सूख गई मेरे देखते-देखते
जाती थी माँ जहाँ-
कपडे का गट्ठर सिर पर रख
कपडे धोने
और बताया करती थी हमें-
बुआ के साथ की गपशप और किस्से

मैंने देखा था नदी को
गणगौर पर्व में और
संजा पर्व में -
जब विदा करती थी उसे
गले लगा -उसी नदी में

मेरी बेटी सिर्फ जानती है
कि मैं विदा किया करती थी
गणगौर और संजा

लेकिन उसकी बेटी?
अपनी "मायरा"?
सुनेगी कहानियों में-
गणगौर,संजा,नदी और नानी के किस्से!!!

9 comments:

Digvijay Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 03 अप्रैल 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (04-04-2017) को

"जिन्दगी का गणित" (चर्चा अंक-2614)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
विक्रमी सम्वत् 2074 की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Dhruv Singh said...

बहुत सुंदर ! सत्यता के पट खोलती। धन्यवाद

तरूण कुमार said...

सुन्दर शब्द रचना

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन सैम मानेकशॉ और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है।कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Sudha Devrani said...

बहुत सुन्दर.......
वाह!!!
मेरे गाँव की नदी सूख गयी...
लाजवाब
http://eknayisochblog.blogspot.in

Digamber Naswa said...

ये जिम्मेवारी हमारी है इनको बचा के रखने की जो हम नहीं कर पा रहे ... अच्छी रचना ...

Onkar said...

यथार्थ का चित्रण करती रचना

संजय भास्‍कर said...

बहुत सुन्दर.......