Thursday, January 2, 2014

सुबह-सुबह...

सुबह-सुबह गिरती है जब ओस
भीग जाता है मन
देखकर अलसाते फूल
उनींदी आँखों से दिखाता है सूरज
एक सपनीला नज़ारा
धुंध में छिपा लगता है
प्रकृति का कण-कण प्यारा
सिहरन देती चलती है
मॉर्निंग वॉक करती ठंडी हवा
उम्र कई साल पीछे जा
हो जाती है नटखट- जवां
अलाव से उठता धुंआ
रगड़ती हथेलियां
गर्माता खून
और दुबके परिंदे देख मन भरता है उड़ान
और लांघता है लम्बा पुल
यादों का
पार होते ही गलियारा दूसरी ओर दिखता है फिर एक पुराना
सपनीला नजारा
फिर गिरती है ओस
इस बार कोर से
उनींदी आँखों की
भीग जाता है मन
सुबह-सुबह ..

9 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (03-01-2014) को "एक कदम तुम्हारा हो एक कदम हमारा हो" (चर्चा मंच:अंक-1481) पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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ईस्वीय सन् 2014 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

देवेन्द्र पाण्डेय said...
This comment has been removed by the author.
देवेन्द्र पाण्डेय said...

कोमल, प्यारे, सुख देते, कुछ कहते एहसास..

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

सर्द मौसम और एहसासों की गर्मी.. जाड़े की हक़ीक़त और यादों के सपने..
और आख़िर में गुलज़ार सा'ब का एक शे'र:

कौन पथरा गया है आँखों में,

बर्फ पलकों पे क्यों जमी सी है!!

Pratibha Verma said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति। । नव वर्ष की हार्दिक बधाई।

Onkar said...

बहुत सुन्दर

प्रवीण पाण्डेय said...

हर सुबह नया जीवन दे जाती है।

Ramakant Singh said...

यादो के झरोखे से झाँकता मन पखेरू
खूबसूरत एहसास

expression said...

बहुत ही सुन्दर भाव....

अनु