जीवन में, सुखों और दुखों के बीच बिताए सुहाने पलों की खुमारी वाईन की खुमारी से बेहतर है
ऐसा नशा चढ़ता है कि
होश ही नहीं रहता
कभी देखे हैं तुमने जीवन के इंद्र धनुषी रंग...
इनसे बिछड़कर जाने का
मन नहीं होता कभी
सारी रंगीन तसवीरें
साफ़ जो होती है..
आईने की तरह..
चमकती है --
धूप की तरह...
-अर्चना
इस रचना को लिखा और गाया देवेन्द्र ने है, जो सबसे आगे बैठा है ..... :-)
बड़े अच्छे लगते हैं...
ये धरती, ये नदिया ,
मेरे पापा और तुम........ बड़े अच्छे लगते हैं...
माँ की बातें, माँ की रातें, याद रहेगी हमको,
मन की बातें, माँ ही जाने, आँच लगे जब हमको,
बड़े अच्छे लगते हैं...
वो निंदिया, वो लोरी ,
वो गोदी और तुम...........बड़े अच्छे लगते हैं..
माँ बिन है ये,घर ही सूना,सूना-सुना जग है,
माँ हैं तो फ़िर, सारी खुशियाँ,माँ का आँचल सब है,
बड़े अच्छे लगते हैं...
वो ममता, वो आँचल,
वो सपने और तुम.............बड़े अच्छे लगते हैं...
माँ ही है जो हमको पाले,भूले अपने छाले,
कर बैठे हम, भूल कभी भी, माँ ही हमें संभाले,
बड़े अच्छे लगते हैं
वो चप्पी, वो पप्पी,
वो झप्पी, और तुम............बड़े अच्छे लगते हैं...
माँ की पूजा ही में शामिल,है जग की सब पूजा,
माँ ही मेरा, सब-कुछ है बस, और नहीं कोई दूजा
बड़े अच्छे लगते हैं...
वो भगवन, वो आँगन,
वो तुलसी... और.... और तुम ...बड़े अच्छे लगते हैं...
माँ तुझे मैं याद रख सकूँ, ऐसी शक्ती देना
भूला कभी जो तुझको तो मैं, माफ़ मुझे ना करना
बड़े अच्छे लगते हैं...
वो दादी, वो नानी, वो कहानी और तुम...
बड़े अच्छे लगते हैं.....
ये धरती, ये नदिया ,
मेरे पापा और तुम........ बड़े अच्छे लगते हैं...
-देवेन्द्र पाठक
===::@::=== मैं तुझसे लड़ती भी हूँ, झगड़ती भी.. मैं तुझसे बड़ी भी हूँ छोटी भी..
बाँधा है मैंने तुझको
शब्दों के बन्धन से...
महकता है ये रिश्ता
बिना ही चन्दन के
डोर ये ऐसी नहीं कि टूट जाए झट से..
चलो अब मुँह खोलो और मिठाई खाओ फट से..
ढेर सारे आशीष तुमको मेरे प्यारे भैया
अब चाहे "दी" कहो "दीदी" कहो या कहो "दिदिया"...
-अर्चना
मैं और तुम खुद ही की सोचते
कई हैं ऐसे... करते काम सिर्फ़ स्व के लिए ही क्या बदलेगा!! कौन समझे? और समझाए भी करो खुद ही... खुद में खोजें खुदा को भी पा लेंगे
ॐ शान्ति शान्ति!!! एक ही सच सत्यमेव जयते सीख लें बस!! सच के आगे
सब कुछ बेमानी बाकी नादानी...