Friday, September 17, 2010

बता सकते हो?

कांटो में फंस चुकी हूँ ,हंसने को कहते हो क्यों
न  ठौर न ठिकाना,बसने को कहते हो क्यों
एक भी सुराख ना मिला अब तक मुझे
यूं किरण बनकर चमकने को कहते हो क्यों...

21 comments:

वीना said...

बहुत अच्छा लिखा है

एक भी सुराख ना मिला अब तक मुझे
यूं किरण बनकर चमकने को कहते हो क्यों..

क्या बात है...

arvind said...

एक भी सुराख ना मिला अब तक मुझे
यूं किरण बनकर चमकने को कहते हो क्यों..
...vaah laajavaab.

सतीश सक्सेना said...

सब कुछ तो कह दिया यहाँ ....

Babli said...

वाह क्या बात है! बहुत बढ़िया लिखा है आपने!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरत अभिव्यक्ति

ktheLeo said...

सुन्दर रचना! "सच में" पर आने और सुन्दर विचार व्यक्त करने के लिये धन्यवाद!

दीपक 'मशाल' said...

काफी अच्छी बन पड़ी है ये क्षणिका..

ali said...

किरण को अपना काम करना चाहिए !

राजीव तनेजा said...

सुन्दर क्षणिका

संजय कुमार चौरसिया said...

बहुत अच्छा लिखा है

संजय कुमार चौरसिया said...

बहुत अच्छा लिखा है

हमारीवाणी.कॉम said...

अच्छी अच्छा लिखा है



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टीम हमारीवाणी

आज की पोस्ट-
हमारीवाणी पर ब्लॉग पंजीकृत करने की विधि

सम्वेदना के स्वर said...

क्योंकि इसी में जीवन है...संघर्ष से जूझकर प्राप्त जीवन!!

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही व्यग्रता समेटे पंक्तियाँ।

उन्मुक्त said...

यह कविता ही है न।

Udan Tashtari said...

उन्मुक्त जी को बतायेंगी तो हम भी सुन लेंगे जबाब...


वैसे है अच्छी. :)

Gourav Agrawal said...

भावनाओं का सुनामी
इतने कम शब्दों में ??

कमाल है .. वाह .. वाह

दीपक 'मशाल' said...

आज आपका ब्लॉग चर्चा मंच की शोभा बढ़ा रहा है.. आप भी देखना चाहेंगे ना? आइये यहाँ- http://charchamanch.blogspot.com/2010/09/blog-post_6216.html

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

मुक्तक बहुत सुन्दर है!

उपेन्द्र " the invincible warrior " said...

bahoot achchhe jazbat........

Mrs. Asha Joglekar said...

बहुत बढिया क्षणिका ।