न गज़ल के बारे में कुछ पता है मुझे,
न ही किसी कविता के,
और न किसी कहानी या लेख को मै जानती,
बस जब भी और जो भी दिल मे आता है,
लिख देती हूँ "मेरे मन की"
Friday, September 17, 2010
बता सकते हो?
कांटो में फंस चुकी हूँ ,हंसने को कहते हो क्यों
न ठौर न ठिकाना,बसने को कहते हो क्यों
एक भी सुराख ना मिला अब तक मुझे
यूं किरण बनकर चमकने को कहते हो क्यों...
19 comments:
बहुत अच्छा लिखा है
एक भी सुराख ना मिला अब तक मुझे
यूं किरण बनकर चमकने को कहते हो क्यों..
क्या बात है...
एक भी सुराख ना मिला अब तक मुझे
यूं किरण बनकर चमकने को कहते हो क्यों..
...vaah laajavaab.
सब कुछ तो कह दिया यहाँ ....
वाह क्या बात है! बहुत बढ़िया लिखा है आपने!
खूबसूरत अभिव्यक्ति
सुन्दर रचना! "सच में" पर आने और सुन्दर विचार व्यक्त करने के लिये धन्यवाद!
काफी अच्छी बन पड़ी है ये क्षणिका..
किरण को अपना काम करना चाहिए !
सुन्दर क्षणिका
बहुत अच्छा लिखा है
बहुत अच्छा लिखा है
क्योंकि इसी में जीवन है...संघर्ष से जूझकर प्राप्त जीवन!!
बहुत ही व्यग्रता समेटे पंक्तियाँ।
यह कविता ही है न।
उन्मुक्त जी को बतायेंगी तो हम भी सुन लेंगे जबाब...
वैसे है अच्छी. :)
भावनाओं का सुनामी
इतने कम शब्दों में ??
कमाल है .. वाह .. वाह
मुक्तक बहुत सुन्दर है!
bahoot achchhe jazbat........
बहुत बढिया क्षणिका ।
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