Sunday, June 8, 2014

पर्यावरण और हम ...






















इश्क करो हरियाली से 

जंगल की खुशहाली से

पंछी- पशु ,उड़े -फ़िरे

बुझे प्यास नदी तीरे

भरके स्नेह बाल्टी 

बहे सुगंध मालती 

वो प्यार से उचारती

     वसुन्धरा पुकारती ....

3 comments:

SKT said...

Hare man bhare najare..

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (10-06-2014) को "समीक्षा केवल एक लिंक की.." (चर्चा मंच-1639) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Vaanbhatt said...

सुन्दर सन्देश...